Wednesday, December 1, 2010

लम्हे...

कुछ समय के लिए बहार जा रही हूँ ... आप सब से लगभग एक महीने बाद मुलाक़ात होगी ... जाते जाते इस पुरानी रचना फिर से पोस्ट किये जा रही हूँ ... उम्मीद है आप सब को पसंद आएगी ....


.........तुमसे मिलने के बाद,
दिल की इस बंजर ज़मीन पर,
मोहब्बत का एक पेड़ उग आया था,...
हम अक्सर उसके साए में मिला करते थे,
घंटों बातें किया करते थे,
वक्त गुज़ारा करते थे,....
लम्हे पे लम्हे इकठा होते गए,
उस पेड़ के पत्ते बनते गए,
हज़ारों लम्हों के हज़ारों पत्ते,
पेड़ घना होता गया,
और हरा होता गया,......

फिर एक दिन अचानक 
तुम्हें जाना था,.......
बस,.......जाना था,....
वो लम्हे सारे जो एक-एक कर संजोये थे,
......सब सूख गए,....
उस पेड़ से टूट गए,....
तुम उन्हें कुचलते हुए,
बेदर्दी से रौंदते हुए चलते गए,.....
हर पत्ता तुमसे कुछ कहता रहा,
चीखता रहा, चिल्लाता रहा,
रिश्तों की दुहाई देता रहा,......
लेकिन तुमने मुड़कर एक बार भी नहीं देखा,
आखिरकार उन्होंने दम तोड़ दिया,
वहीँ, उसी ज़मीं में दफ़न हो गए,
......

.........अब वहां से कोई नहीं गुज़रता,
आज भी उस उजड़े हुए पेड़ के पास,
कुछ रोने की आवाज़ें आतीं हैं,......
कहते हैं.... 
उन लम्हों की रूहें आज भी वहाँ भटकतीं हैं......

Sunday, November 28, 2010

तस्वीर....

सोचा एक तस्वीर बनाऊं
आँखें बंद कीं
कुछ लकीरें सी उभर आयीं
टेढ़ी, मेढ़ी, आड़ी, तिरछी
फिर सोचा,
इसकी अपूर्णता को संवार लूं 
इसमें कोई रंग उतार दूं
लेकिन वो कौन सा रंग था 
जो इस तस्वीर की ताबीर करेगा ??
इसकी कमियों, 
अपूर्णताओं को दूर करेगा ??

हरा...??
मन किया पत्तों से उधार लूं
पर वो तो एक दिन सूख जायेगा 
मुरझाया, पेड़ से टूट कर
पैरों तले कुचला जायेगा

नीला...??
थोड़ा आसमान से मांग लूं
पर बादल के आते ही फीका पड़ जायेगा 
रात होता होता काला
उसका रंग तो बदलता जायेगा

लाल...??
लहू तो बहुत दिखता है
पर अब वो सुर्खी उसमें नहीं है 
धीरे धीरे सफ़ेद हो रहा है 
अपना वजूद खो रहा है ....

पीला...??
ये तो सूरज लिए फिरता है
पर सांझ होते होते 
वो कहीं खो जाता है
बुझ जाता है ....


इन्द्रधनुष...??
उसमें तो बहुत रंग दिखते हैं
पर सब आँख के धोखे हैं 
उससे मैं क्या उम्मीद करूँ 
जो खुद दूसरों के भरोसे है...

इतने में मेरी चेतना मुझसे बोल पड़ी- 
  "अपनी तस्वीर को क्यूँ न 
   तू अपने ही रंग से रंग दे...
   तेरा रंग जो पक्का है 
   कई इम्तेहानों से गुज़रा है 
   उस पर वक़्त का निशाँ नहीं 
   वो किसी का मोहताज नहीं 
   हमेशा दमकता रहेगा, चमकता रहेगा 
   और जिस दिन तू मिट्टी 
   उस मिट्टी से मिल जाएगी 
   रूप भले ही बदल जाये 
   पर रंग कभी नहीं बदलेगा"

अपनी तस्वीर को मैंने 
अपने ही रंग से रंग दिया 
नीचे अपना नाम लिख दिया
.......................... क्षितिजा

Friday, November 19, 2010

उफ़ !!....





















इस तरह,  हर गम से खुद को बचा रखा है 
एहसास को पत्थर का लिबास पहना रखा है...

मेरी आँखों में अक्सर उतर आता है सैलाब
कुछ तूफानों को अपने दिल में बसा रखा है....

तेरी यादों की क़ैद से भाग भी जाते लेकिन 
ये ताला हमनें अपने हाथों से लगा रखा है.....

राहे-उसूल पे कुछ न मिला एक दर्द के सिवा 
अपने वजूद को गहरे ज़ख्मों से सजा रखा है...

तड़प रहा है रूह का पंछी, कितने ही सालों से
रेशा-रेशा उम्र जोड़ जिस्म ने जाल बना रखा है ..

आहें, सर-सराहटें, सिसकियाँ, सरगोशियाँ हर सू
उफ़!! ख़ामोशी ने, तन्हाई ने, कितना शोर मचा रखा है...

Monday, November 8, 2010

शायद....















क्यूँ मद्धम सी हो चली हर उम्मीद की रौशनी 
....................अंधेरों से लड़ता कोई चिराग़
शायद, बुझ गया है कहीं.........................


पहचानी सी ख़ुश्बू महका रही है मेरा 'आज'
.......................माज़ी की कब्र में वो लम्हा 
शायद, सांस ले रहा है कहीं......................


कम हो गया एक और ख़ुदा को मानने वाला 
..........................किसी बेबस ग़रीब के घर 
शायद, कहर टूटा है कहीं.........................


सुर्ख हो गया अचानक मीठा 'चेनाब' का पानी
.......................फिर मोहब्बत की तकदीर से 
शायद, लहू रिस रहा है कहीं........................


ख़ामोशी चीर गई इंसानियत तेरे वजूद को
......................रोता बिलखता भूखा बच्चा 
शायद, सो गया है कहीं...........................


हर आह, हर आंसू, हर दर्द, हर ज़ख्म छुप गया
.......................मुर्दा रूह ने ज़िन्दा जिस्म का 
शायद, कफ़न ओढ़ा है कहीं..........................






Monday, October 25, 2010

एक रूठा सा रब.....






















रूखा रूखा सा चाँद, एक फीकी सी शब् 
बुझी बुझी सी मैं, एक रूठा सा रब.....

 मैं औरत..... वो बरगद ....
....तहज़ीब की मिट्टी में गडी हूँ गहरी
सदियों से खोखले रिवाजों का बोझ सहती रही ...
....बहती हवाओं की जानिब झुकते चले गए
हाल ही में जन्में लचीले बांस हैं 'सब'.....


मैं औरत..... वो चट्टान ....
.......रवायतों की परतों से बनी
मेरा वजूद ठहरा रहा, और पिछड़ता गया...
......भागते वक़्त के साथ आगे बढ़ते चले गए
तेज़ तर्रार जदीद* रस्ते हैं 'सब' ...........


मैं औरत...... वो रूह....
.......वो क्षितिज हूँ, जो बे-इंतहा है
मेरे अंजाम में मेरी इब्तिदा का आगाज़ है....
.....मुझ तक पहुँचने की नाकाम कोशिश करते
हस्ती-ए-फ़ानी*, सिर्फ जिस्म हैं 'सब'.....

रूखा रूखा सा चाँद, एक फीकी सी शब् 
बुझी बुझी सी मैं, एक रूठा सा रब.....

[जदीद = आधुनिक
 हस्ती-ए-फ़ानी = नश्वर जीवन ]

Saturday, October 23, 2010

रात जाते-जाते....





















.रात की चादर जब उतरने लगी.
...सुबह की तरफ सरकने लगी...
......तारे सारे जगमगा उठे........
...और ख्वाब सारे धुंधला गए...

....तो ऐसे में ये क्या बात हुई....
..............जो भी हुई ...............
...........कुछ ख़ास हुई.............

.....चाँदनी अपनी तपिश में......
....सर्द जज़्बात पिघला गयी.....
....एक दर्द कहीं सुलगने लगा...
..तेरा सोया एहसास जगा गयी..

...........रात जाते-जाते............
...आज ये क्या काम कर गयी...
........अब भी मैं ज़िन्दा हूँ .........
........ये यकीन दिला गयी..........

Monday, October 18, 2010

बिना तर्क के.....

 
ख्वाबों की दुनिया
बिना 'शोर' के....

ज़िन्दगी का सफ़र
बिना 'पड़ाव' के....

एक नया सवेरा
बिना 'कोहरे' के...

मेरा अपना घर
बिना 'दीवारों' के....

सुबह का अखबार
बिना 'सुर्खी' के....

सुहाग की सेज
बिना 'जिस्मों' के....

इंसान का नाम
बिना 'पहचान' के....

आकाश, समुंदर, ज़मीन
बिना 'सरहद' के....

एक रिश्ता हमारा
बिना 'मैं' के....

पूर्णिमा का चाँद
बिना 'दाग' के....

गंगा का पानी
बिना 'पाप' के.....

मेरा आखरी लिबास
बिना 'सिलवट' के....

ये उम्मीदें मेरी
ये सपने मेरे...
बिना 'तर्क' के.....

Monday, October 11, 2010

दायरे....
















बचपन में कभी कभी
टूटे पंख घर ले आती थी
अब्बू को दिखाती थी..

अब्बू यूँ ही कह देते-......
   "इसे तकिये के नीचे रख दो 
   और सो जाओ
   सुबह तक भूल जाओ
   वो दस रुपये में बदल जाएगा
   बाज़ार जाना
   जो चाहे खरीद लाना..."

मैं ऐसा ही करती ...

रात में अब्बू चुपके से
पंख हटा कर दस रुपये रख देते..
सुबह उठते ही बेसब्री से
दुकाने खुलने का इंतज़ार करती
कोई एक मासूम सा सपना 
खरीद लाती ...

.......वो सोच कर आज मैं  
एक उदास हंसी हंस देती हूँ....

अब चाहे कितने ही टूटे हुए पंख
कितने ही रुपयों में क्यूँ न बदल जाएं
वो मुस्कराहट  
वो ख़ुशी नहीं खरीद सकते.....
हमारी बेहद ख्वाहिशें
ज़रुरत से ज़्यादा बड़े सपने
इनके दायरे में नहीं समाते ...

.....या फिर यूँ कहें
किसी दायरे में नहीं समाते....

Saturday, October 2, 2010

तेरे साए में पनाह दूं........















...................क्षितिज तक फैले
ज़िन्दगी के तनहा सेहरा को.....
तेरे
इश्क की बाहों में समा लूं....

तेरे  एहसास के गहरे समुन्दर से
उम्र की 'सूखी' रेत भिगो दूं....

......और कहीं किनारे बैठ कर  
थोड़े घरौंदे बना कर..............
एक गाँव बसा दूं...................

................कभी उसे हकीक़त
तो कभी ...सपने का नाम दूं...

तेरे साए में पनाह दूं................

Wednesday, September 22, 2010

.......पाया दो पल का चाँद






















 कहाँ ज़िन्दगी अब तेरा ख़याल ही रहता है
आज कल तो दिल खुद से बेखबर रहता है...

शाम होते ही बुझा देते हैं उम्मीदों के चिराग
अब कौन दीवाना तेरे इंतज़ार में रहता है ...

रंज-दीदा जिस्म का लिबास पहने हुए
ये किसका अक्स मेरे आईने में रहता है...

सदी जैसे दिन की मिन्नतें कर पाया दो पल का चाँद
और एक वो है की हमेशा जल्दी में रहता है ...

लहूलुहान है मेरा साया भी अब तो
ज़िन्दगी का रास्ता कब संगमरमर का रहता है ...

रात होते ही जलने लगता है आखों में तेरा ख्वाब
दिन भर जो मेरे दिल में नासूर सा रहता है...

टुकड़े-टुकड़े हुए हैं हम खुद को जोड़ने में
जुड़ते-जुड़ते टूटने का खौफ हर वक़्त रहता है...

Wednesday, September 15, 2010

एक जुल्फ.....



















एक ज़ुल्फ़  माँ की.... जिसके साए में ज़िन्दगी ने आखें खोलीं
एक
ज़ुल्फ़ बहन की.... जिसकी चोटी खीँच-खीँच के बचपन खेला
एक जुल्फ यार की.... जिसकी खुशबु से जवानी महकी
एक
ज़ुल्फ़ बेवफा की.... जिसने मोहब्बत का गला घोंटा
एक
ज़ुल्फ़ साकी की....जिसमें शराब से ज्यादा नशा था
एक
ज़ुल्फ़ बीवी की....जिसने उन्हें कदमों में बिछा दिया
एक
ज़ुल्फ़ बेटी की.... जिसने खुदा से मिला दिया

"हर ज़ुल्फ़ की एक कहानी है
हर
ज़ुल्फ़ का एक अफसाना
जिंदगियों को जोड़ती-तोड़ती है ये
बुनती है रिश्तों का ताना-बाना....."

Thursday, September 9, 2010

त्रिवेणी ...

















आसमान में जशन का माहौल है
आतिशबाज़ी होती दिखाई दे रही है.....

मेरी किस्मत के सितारे टूट-टूट के राख हो रहे हैं.....

Sunday, September 5, 2010

बस....जी गए....

    


















कैसे-कैसे हाल में
हम कैसे-कैसे जी गए....

कभी बारिश में सुलग गए
कभी धुप में भी सिल गए
कभी बर्फ में पिघल गए
           एक ही ज़िन्दगी में हम
           हज़ार हादसों से गुज़र गए.....
कैसे-कैसे हाल में
हम कैसे-कैसे जी गए....

कुछ हंसी में चिप गए
कुछ आंसुओं में छलक गए
कुछ खूने-जिगर भी बन गए
           न जाने कितने रूप में
           हम ग़मों को पे गए.......
कैसे-कैसे हाल में
हम कैसे-कैसे जी गए....

जो बदन पे थे वो छिल गए
जो दिल पे थे वो रिस गए
जो रूह पे थे वो गहरा गए
           वक्त के नाज़ुक धागों से
           हम ज़ख्मों को सी गए
कैसे-कैसे हाल में
हम कैसे-कैसे जी गए.... 

बस....जी गए....   
     

Monday, August 23, 2010

लम्हे....












 




.........तुमसे मिलने के बाद,
दिल की इस बंजर ज़मीन पर,
मोहब्बत का एक पेड़ उग आया था,...
हम अक्सर उसके साए में मिला करते थे,
घंटों बातें किया करते थे,
वक्त गुज़ारा करते थे,....
लम्हे पे लम्हे इकठा होते गए,
उस पेड़ के पत्ते बनते गए,
हज़ारों लम्हों के हज़ारों पत्ते,
पेड़ घना होता गया,
और हरा होता गया,......

फिर एक दिन अचानक 
तुम्हें जाना था,.......
बस,.......जाना था,....
वो लम्हे सारे जो एक-एक कर संजोये थे,
......सब सूख गए,....
उस पेड़ से टूट गए,....
तुम उन्हें कुचलते हुए,
बेदर्दी से रौंदते हुए चलते गए,.....
हर पत्ता तुमसे कुछ कहता रहा,
चीखता रहा, चिल्लाता रहा,
रिश्तों की दुहाई देता रहा,......
लेकिन तुमने मुड़कर एक बार भी नहीं देखा,
आखिरकार उन्होंने दम तोड़ दिया,
वहीँ, उसी ज़मीं में दफ़न हो गए,
......

.........अब वहां से कोई नहीं गुज़रता,
आज भी उस उजड़े हुए पेड़ के पास,
कुछ रोने की आवाज़ें आतीं हैं,......
कहते हैं.... 
उन लम्हों की रूहें आज भी वहाँ भटकतीं हैं......

Friday, August 20, 2010

कारीगर.....



काश! ये ज़ख्म भी कभी सिल पाता....
उधड़ा हुआ वो रिश्ता फिर जुड़ पाता....

न रिसता लहू, न दर्द उठता कभी
न ही नज़र आती कोई गाँठ कहीं
गिरहें न रहती, न निशाँ ही दिखता
न गिला , न शिकवा कोई....

काश! कोई कारीगर
ऐसा मिल पाता .....
काश! ये ज़ख्म कोई ऐसे सिल
पाता....

दस्तक ....


कुछ इस तरह तुम्हारी याद ने दस्तक दी
निकल पड़ी घर से तुम्हारा निशान ढूँढने.....

जहां जहाँ से हमसफ़र बन के गुज़रे थे
चुन लायी हर उस राह-ए-गुज़र से.....

कुछ तकिये के नीचे कुछ पलकों में छुपाये हैं
ठहरी सी यादों के सहारे कुछ ख्वाब सजाये हैं......

Thursday, August 19, 2010

जुगनू.......







अंधेरों में कहीं खो गयी थी.............
ज़िन्दगी ने जब पहली आह भरी थी 
शायद .....तब से..........................

कुछ नज़र नहीं आ रहा था ..............
साया भी साथ छोड़ चूका था, शायद
अपने भी खो जाने के डर से............


बिलकुल अकेली थी....................
...............दोनों हाथों से................
तन्हाइयों की गर्द टटोलती हुई.........
.................आखें दस गुना खोल कर
राह खोजती हुई,.....बस चल रही थी

फिर दूर कहीं .............................
.............कुछ रौशनी सी नज़र आई
उम्मीद की एक लौ टिम-टिमाई.....
 .................मैं उसकी ओर चल दी
वो भी मेरी तरफ आ रही थी...........

एक जुगनू था........हांफता हुआ......
कुछ कांपता हुआ.........................
मुझसे बोला-..............................
......"कुछ चमका था शायद यहाँ......
......उसे देख कर इस तरफ आया हूँ..
......भटक रहा हूँ अकेला वीरानों में..
......एक साथी ढूँढने आया हूँ..........."

जिस्म को चीर देने वाली खामोशी में
सालों बाद किसी ने बात की थी.........
मेरा रोम-रोम उसे सुन रहा था..........
उसके हर लफ्ज़,.....उसकी आवाज़ में 
नहा रहा था..................................

उसको देखती रही, उसमें खो सी गयी
कुछ पल बाद होश आया, तो पाया-.....
......आखों की नमी होठों को छु रही थी
एक मुस्कान बनकर ठहर गयी थी......


उससे बोली-..................................
....."आखों में समुंदर छिपा था...........
......उम्र का दर्द अपने में लिए था.......
......तुम्हें देखते ही..........................
......ख़ुशी का आंसू बन गया..............
......हर ज़हर,.......... हर कड़वाहट......
......अपने संग बहा ले गया...............
......वो ही था जो तुमने देखा था ........
......वो ही था जो ........चमका था....."

 हाँ!...वो ही था जो चमका था...उस रात........!!






Monday, August 16, 2010

शुरुआत...



             चलिए शुरुआत एक बात से करतें हैं...कुछ ही महीने पहले की बात है ... किसी  ने मुझसे पुछा था की हमें कभी किसी फकीर को बुरा क्यूँ नहीं बोलना चाहिए ??... मैंने जवाब तो दिया था पर उसका जवाब, लाजवाब था...    
               उसने कहा की जो भी बात किसी  से कही जाती है वो एक energy के form में travel करती है... अगर हम receive कर लें तो हमपे असर होता है अगर हम receive न करीं तो वो 40 दिनों के बाद उसी तक पहुँच जाती है जिसने बोली होती है... तो फकीर इस energy को receive नहीं करते और अगर हम बुरा बोलतें है तो वो हमें वापिस आकर परेशान करती है... 
                ये सिर्फ फकीरों के साथ नहीं बल्कि हर इंसान पे लागू होता है ... अगर हम किसी की कही हुई बात को अनसुना कर दें तो वो वापिस चली जाएगी जहां से आई है... 
              उसकी बात सुन कर मैंने सोच ये बहुत अच्छा तरीका है खुश रहने का ... मैं भी कोशिश करुँगी ऐसा कुछ करने की... थोड़ी की भी... 
               फिर ख़याल आया की मुझे बुरा कौन बोलता है ... जाने या अनजाने ... और वो कौन हैं जिनकी बातों का असर मुझ पर होता है... वो मेरे अपने ही तो हैं...अगर मैं receive नहीं करुँगी तो वो वापिस जा कर उनको परेशान करेगा ...फिर वो दुखी होंगे ... और अगर वो दुखी होंगे तो मैं खुश कैसे रहूंगी....दोनों सूरतों में मैं खुश नहीं हो सकती...इससे अच्छा है की receive कर लूं ... किसी और को दुखी करने के बजाये खुद ही दुखी हो लूं... 
               दोस्त! तुमने बात तो बहुत पते की बताई थी ... शायद मेरे जैसे पागल इंसान पे लागू नहीं होती... पर मैं ये चाहती हूँ की तुम इससे हमेशा अपनाओ.. ताकि तुम हमेशा खुश रहो ... शायद तुम ये अपनाते भी हो क्यूंकि मैंने तुममे फकीरों सी बात पाई है ... कौन सी ???... इसका जवाब फिर कभी...पर हाँ आजतक मैंने जो तुम्हें बुरा कहा है ... उसने वापिस लौट कर मुझे बहुत दुखी किया है...
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