Thursday, August 19, 2010

जुगनू.......







अंधेरों में कहीं खो गयी थी.............
ज़िन्दगी ने जब पहली आह भरी थी 
शायद .....तब से..........................

कुछ नज़र नहीं आ रहा था ..............
साया भी साथ छोड़ चूका था, शायद
अपने भी खो जाने के डर से............


बिलकुल अकेली थी....................
...............दोनों हाथों से................
तन्हाइयों की गर्द टटोलती हुई.........
.................आखें दस गुना खोल कर
राह खोजती हुई,.....बस चल रही थी

फिर दूर कहीं .............................
.............कुछ रौशनी सी नज़र आई
उम्मीद की एक लौ टिम-टिमाई.....
 .................मैं उसकी ओर चल दी
वो भी मेरी तरफ आ रही थी...........

एक जुगनू था........हांफता हुआ......
कुछ कांपता हुआ.........................
मुझसे बोला-..............................
......"कुछ चमका था शायद यहाँ......
......उसे देख कर इस तरफ आया हूँ..
......भटक रहा हूँ अकेला वीरानों में..
......एक साथी ढूँढने आया हूँ..........."

जिस्म को चीर देने वाली खामोशी में
सालों बाद किसी ने बात की थी.........
मेरा रोम-रोम उसे सुन रहा था..........
उसके हर लफ्ज़,.....उसकी आवाज़ में 
नहा रहा था..................................

उसको देखती रही, उसमें खो सी गयी
कुछ पल बाद होश आया, तो पाया-.....
......आखों की नमी होठों को छु रही थी
एक मुस्कान बनकर ठहर गयी थी......


उससे बोली-..................................
....."आखों में समुंदर छिपा था...........
......उम्र का दर्द अपने में लिए था.......
......तुम्हें देखते ही..........................
......ख़ुशी का आंसू बन गया..............
......हर ज़हर,.......... हर कड़वाहट......
......अपने संग बहा ले गया...............
......वो ही था जो तुमने देखा था ........
......वो ही था जो ........चमका था....."

 हाँ!...वो ही था जो चमका था...उस रात........!!






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