Friday, August 20, 2010

दस्तक ....


कुछ इस तरह तुम्हारी याद ने दस्तक दी
निकल पड़ी घर से तुम्हारा निशान ढूँढने.....

जहां जहाँ से हमसफ़र बन के गुज़रे थे
चुन लायी हर उस राह-ए-गुज़र से.....

कुछ तकिये के नीचे कुछ पलकों में छुपाये हैं
ठहरी सी यादों के सहारे कुछ ख्वाब सजाये हैं......

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