Monday, August 23, 2010

लम्हे....












 




.........तुमसे मिलने के बाद,
दिल की इस बंजर ज़मीन पर,
मोहब्बत का एक पेड़ उग आया था,...
हम अक्सर उसके साए में मिला करते थे,
घंटों बातें किया करते थे,
वक्त गुज़ारा करते थे,....
लम्हे पे लम्हे इकठा होते गए,
उस पेड़ के पत्ते बनते गए,
हज़ारों लम्हों के हज़ारों पत्ते,
पेड़ घना होता गया,
और हरा होता गया,......

फिर एक दिन अचानक 
तुम्हें जाना था,.......
बस,.......जाना था,....
वो लम्हे सारे जो एक-एक कर संजोये थे,
......सब सूख गए,....
उस पेड़ से टूट गए,....
तुम उन्हें कुचलते हुए,
बेदर्दी से रौंदते हुए चलते गए,.....
हर पत्ता तुमसे कुछ कहता रहा,
चीखता रहा, चिल्लाता रहा,
रिश्तों की दुहाई देता रहा,......
लेकिन तुमने मुड़कर एक बार भी नहीं देखा,
आखिरकार उन्होंने दम तोड़ दिया,
वहीँ, उसी ज़मीं में दफ़न हो गए,
......

.........अब वहां से कोई नहीं गुज़रता,
आज भी उस उजड़े हुए पेड़ के पास,
कुछ रोने की आवाज़ें आतीं हैं,......
कहते हैं.... 
उन लम्हों की रूहें आज भी वहाँ भटकतीं हैं......

18 comments:

  1. Xitija,
    It's very intense and intimate expression of your soul.
    with best wishes...
    Jaya

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  2. Xitija,
    It's very intense and intimate expression of the
    soul.
    With best wishes,
    Jaya

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  3. Xitija ji,
    It took 15 min to read this post but worth reading. You are expressing wonderful feelings in words... Its brilliant work...

    -Dhara

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  4. waah waah waah waah waah waah... kya baat hai... kya likha hai xitija... sach mein mujhe bhi mere saare ped patte yaad aa gaye... love you yaar..

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  5. xitija...badi roohani nazm hai..so nice..keep going :)

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  6. क्षितिजा
    सबसे पहले …
    ख़ूबसूरत ब्लॉग पर ख़ूबसूरत तस्वीर के साथ बेहद ख़ूबसूरत कविता के लिए बधाई !

    दिल की इस बंजर ज़मीन पर,
    कहीं से एक पेड़ उग आया था …

    बहुत संभव है ,
    बीज पड़ने के बाद
    अंकुर से बने पौधे का
    विशाल वृक्ष का रूप धारण कर लेना !
    लेकिन अफ़सोस !
    … प्रेम की वही पारंपरिक परिणति !
    … अब वहां से कोई नहीं गुज़रता,
    आज भी उस उजड़े हुए पेड़ के पास,
    कुछ रोने की आवाज़ें आतीं हैं …
    कहते हैं…
    उन लम्हों की रूहें आज भी वहां भटकतीं हैं …


    बहुत संवेदनशील कविता है ।
    कुछ बरस पहले इन जज़बातों के साथ मैंने भी ऐसी ही एक कविता लिखी थी , याद हो आई ।
    स्मृतियों से साक्षात् के लिए अलग से धन्यवाद दे रहा हूं ।
    शुभकामनाओं सहित …

    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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  7. @राजेन्द्र ji
    aap bahut bahut dhanyawaad... aake baare mein maine padha hai 'udan tashtari' mein ... aapse sarahana pa kar bahut khushi hui ...

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  8. oh wow first time to a blog in hindi...felt so nice.... aapne bahot aacha likha hai!!! hey how do you manage to type in hindi

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  9. आखिरी पंक्ति ने बहुत कुछ कह दिया,

    बधाई

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  10. भावों को सचमुच शब्द दिया आपने... अच्छा लगा.

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  11. क्षितिज़ा जी, आपकी कविता में चंद पंक्तियाँ अपनी तरफ से जोड़ने की गुस्ताखी कर रहा हूँ...


    उन लम्हों की रूहें आज भी भटकती है-

    और मैं सुनती रहती हूँ
    उन रूहों के रोने की आवाजें
    सिसकियाँ लब तक आने नहीं देती
    और आंसुओं को रोक देती हूँ
    बहने से
    ताकि उजड़े पेड़ को हमेशा
    सींचती रहे ये इन रूहों का दर्द
    ताकि बचाए रख सकूँ मैं अपने अंदर के
    बंजार ज़मीन की नमी
    जिस पर वह उजड़ा पेड़ आज भी खड़ा है
    मेरे अस्तित्व की याद दिलाता हुआ.

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  12. bahut khoobsurat panktiyaan rajiv ji .... aapke rachna ko naye mayne de diye ... aapka bahut bahut shukriya shukriya ..

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  13. un lamho ki roohe aaj bhi wahan bhatakti hai
    ye kavita ko bahut sawendasheelta ki aor le jata hai

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  14. क्षितिजाजी,आपकी टिप्पणी पर प्रतिक्रिया देने में विलम्ब हुआ..दरअसल आपके ब्लॉग की रचनाओं को पढ़ रहा था..लम्हें एक ख़ूबसूरत रचना है.उसके लिए ढेर सारी बधाईयाँ..सुधीर दुबे.

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  15. Meri rooh ko chhoo gayi yeh kavita. Hum bhaavnao key dariya mein gote laga rahe hein ab.

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  16. Honest feedback : Your peotry is simply superb. It is very easy to steal this peace of work from internet, paste somewhere and take credit. Write a book on it and publish it, that will give you name and money both.

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