Sunday, September 5, 2010

बस....जी गए....

    


















कैसे-कैसे हाल में
हम कैसे-कैसे जी गए....

कभी बारिश में सुलग गए
कभी धुप में भी सिल गए
कभी बर्फ में पिघल गए
           एक ही ज़िन्दगी में हम
           हज़ार हादसों से गुज़र गए.....
कैसे-कैसे हाल में
हम कैसे-कैसे जी गए....

कुछ हंसी में चिप गए
कुछ आंसुओं में छलक गए
कुछ खूने-जिगर भी बन गए
           न जाने कितने रूप में
           हम ग़मों को पे गए.......
कैसे-कैसे हाल में
हम कैसे-कैसे जी गए....

जो बदन पे थे वो छिल गए
जो दिल पे थे वो रिस गए
जो रूह पे थे वो गहरा गए
           वक्त के नाज़ुक धागों से
           हम ज़ख्मों को सी गए
कैसे-कैसे हाल में
हम कैसे-कैसे जी गए.... 

बस....जी गए....   
     

6 comments:

  1. Mashaallah !!!

    lovely ! hindi poetry is nt my genre , bt i loved tis post....may i ask if u write professionally ? u r gud....al te best....cheers !

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  2. @ Jay Shankar ji
    thanks u very much....

    @just a pen in my hand
    thanks to u too....

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  3. Nice Poet, you have feeling in all you poetry. Its hard to read in Hindi for me, but enjoyed while reading.

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  4. बहुत सुन्दर...

    कैसे कैसे हाल में
    हम कैसे कैसे जी गये....

    क्या बात है...

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  5. kya baat.i had no idea that u r sooooooo talented.keep it up

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