Wednesday, September 22, 2010

.......पाया दो पल का चाँद






















 कहाँ ज़िन्दगी अब तेरा ख़याल ही रहता है
आज कल तो दिल खुद से बेखबर रहता है...

शाम होते ही बुझा देते हैं उम्मीदों के चिराग
अब कौन दीवाना तेरे इंतज़ार में रहता है ...

रंज-दीदा जिस्म का लिबास पहने हुए
ये किसका अक्स मेरे आईने में रहता है...

सदी जैसे दिन की मिन्नतें कर पाया दो पल का चाँद
और एक वो है की हमेशा जल्दी में रहता है ...

लहूलुहान है मेरा साया भी अब तो
ज़िन्दगी का रास्ता कब संगमरमर का रहता है ...

रात होते ही जलने लगता है आखों में तेरा ख्वाब
दिन भर जो मेरे दिल में नासूर सा रहता है...

टुकड़े-टुकड़े हुए हैं हम खुद को जोड़ने में
जुड़ते-जुड़ते टूटने का खौफ हर वक़्त रहता है...

42 comments:

  1. टुकड़े टुकड़े हुए है हम खुद को जोड़ने में
    जुड़ते जुड़ते टूटने का खौफ हर वक़्त रहता है|

    बहुत ही सुन्दर पंक्तिया है| लिखते रहिये|

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  2. बहुत ही खूबसूरती से शब्दों को पिरोया है .....
    यो ही लिखती रहें.......... शुभकामनायें

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  3. @ monika ji ,abhishek ji

    aak dono ka dhanyawaad....:)

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  4. बहुत ही बढ़िया रचना. भावों को समुचित तरीके से अभिव्यक्त किया है आपने.

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  5. bhavnaon ka bahut hi sundar chitran.....

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  6. सृजन की मौलिकता !
    मेरे विचार से आपको वर्ड वेरिफिकेशन नहीं रखना चहिये -इससे टिप्पणी करने वाले थोडा हतोत्साहित होते हैं !

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  7. ब्लाग जगत की दुनिया में आपका स्वागत है। आप बहुत ही अच्छा लिख रहे है। इसी तरह लिखते रहिए और अपने ब्लॉग को आसमान की उचाईयों तक पहुंचाईये मेरी यही शुभकामनाएं है आपके साथ
    ‘‘ आदत यही बनानी है ज्यादा से ज्यादा(ब्लागों) लोगों तक ट्प्पिणीया अपनी पहुचानी है।’’
    हमारे ब्लॉग पर आपका स्वागत है।

    मालीगांव
    साया
    लक्ष्य

    हमारे नये एगरीकेटर में आप अपने ब्लाग् को नीचे के लिंको द्वारा जोड़ सकते है।
    अपने ब्लाग् पर लोगों लगाये यहां से
    अपने ब्लाग् को जोड़े यहां से

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  8. "ये किसका अक्स मेरे आईने में रहता है" -- वाह वाह। बहुत खूब क्षितिजा जी। कभी की लिखी अपनी पंक्तियों की याद दिला दी आपने --

    निहारता हूँ मैं खुद को जब भी तेरा ही चेहरा उभर के आता
    ये आईने की खुली बगावत क्या तुमने देखा जो मैंने देखा

    सादर
    श्यामल सुमन
    www.manoramsuman.blogspot.com

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  9. @ manoj ji
    shukriya aapka....

    @ kailash ji
    bahut bahut danyawaad...

    @ mishra ji
    aapka kaha sar maathe... maine word verification hata diya hai... aapka bahut bahut danyawaad...

    @surinder ji
    bahut bahut danyawaad...

    @ gopal ji
    shukriya aapka ise ghazal ka naam dene ke liye... ye sirf kuch khayaal hain jo man mein uthte hain...

    @ shyamal ji
    dhanyawaad aapka ...

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  10. बहुत खूब - खुद से रिश्ता जोड़ने का प्रशंसनीय प्रयास - शुभकामनाएं

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  11. "रात होते जलने लगता है आखों में तेरा ख्वाब
    दिन भर जो मेरे दिल में नासूर सा रहता है...

    टुकड़े-टुकड़े हुए हैं हम खुद को जोड़ने में
    जुड़ते-जुड़ते टूटने का खौफ हर वक़्त रहता है... "

    अच्छी लगी ये पंक्तियां.

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  12. ऐसी लेखनी तो उसकी ही हो सकती है जिसे साक्षात् माँ सरस्वती का आशीर्वाद हो बहुत ही अच्छे लेखन के लिए बधाई और उसे पढ़ने का मौका मुहैया करने के लिएशुक्रिया

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  13. बहुत ही खूबसूरती से शब्दों को पिरोया है|

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  14. यूँ चांदनी रात थी.. और ये तुम्हारी ही आहटें थी..
    चाँद भी उतर आया था हमारे पास ..
    बस यूँ झकझोरा किसी ने तो ...
    न तुम थे ..और वो चाँद दूर मुस्कुरा रहा था मेरी तन्हाई पर ...
    Sujit Kumar Lucky : Live In Own Thoughts

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  15. Just to check if word verification is still there oh yes its still there ...
    Anyway as you please!

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  16. आदरणीय आप बहुत सुन्दर एवं संवेदनाओं से ओतप्रोत लिखती हैं। यदि आपकी बिना शर्त अनुमति हो और तो बिना किसी पारिश्रमिक प्रदान किये हम आपकी रचनाओं को जयपुर से प्रकाशित और दिल्ली सहित १७ राज्यों में प्रसारित हिन्दी पाक्षिक समाचार-पत्र प्रेसपालिका में प्रकाशित करने पर विचार कर सकते हैं। आपकी सहमति की अपेक्षा है।
    शुभाकांक्षी
    डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
    Mail : dr.purushottammeena@yahoo.in
    सम्पादक-प्रेसपालिका

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  17. सुन्दर रचना. नैराश्य भी मानव जीवन अभिन्न अंग है , लेकिन इससे बचने की नितांत जरुरत .

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  18. बहुत ही खूबसूरती से कोमल भावोँ को संजोया हैँ आपने रचना मेँ। बहुत-बहुत आभार! - VISIT MY BLOG :- ऐ-चाँद बता तू , तेरा हाल क्या है।.............कविता को पढ़कर अपने अमूल्य विचारोँ को व्यक्त करने के लिए आप सादर आमंत्रित हैँ। आप इस लिँक पर क्लिक कर सकती हैँ।

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  19. अच्छे लिंक्स ,धन्यवाद । आप खबरों के लिए पढ़ सकते हैं "खबरों की दुनियाँ"

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  20. अच्छा लिखा है .लिखती रहिये.

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  21. Bhut hi sundar aur komal bhavnaon ko prastut kiya hai apne.

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  22. बहुत ही सुन्दर.........सबसे पहले आपकी रचना से मेल खाती तस्वीर के लिए.......इस मामले में मैं समझता हूँ की कितनी मेहनत से ढूँढनी पड़ती हैं ये तस्वीरें.............दूसरा आपकी रचनाओ में कुछ ऐसा है जो आपको दूसरों से अलग खड़ा करता हैं .....मैंने पहले भी कहा था आप कुछ ऊपर उठती हैं....... .....शानदार रचना ........पर कुछ सुझाव हैं ........उम्मीद है आप बिना बुरा माने उन पर ध्यान देंगी .............

    पहले शेर में बेखबर की जगह अगर अनजान होता .....
    रंज-दीदा की जगह रंजीदा....
    लहू-लोहन की जगह लहूलुहान ...
    मरमर से शायद आपका तात्पर्य संगमरमर से है.....
    रात होते ही ......होना चाहिए था ..........

    इन सब के पीछे मेरा मकसद सिर्फ इतना है की प्रकाशित करने से पहले एक बार आप खुद पूरी रचना को बारीकी से पढ़े तो ये चीज़े खुद आपकी पकड़ में आ जाएंगी..........अगर कुछ बुरा लगा हो तो माफ़ी चाहता हूँ |

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  23. @ ansaari sahaab

    pehle to aap ka bahut bahut shukriya ... meri rachna aapko pasand aayi iske liye ... aur jo aapne itne achhe shabdon ka upyog kiya hai uske liye bhi shukriya...

    aapne kuch baarikiyaan batain hain meri rachna mein ... maine koshish ki jitna ho sake us par amal karne ki ...

    lahuluhaan lafz ke liya dhanyawaad ....

    sanmarmar ke liye bhi ... marmar ka arth marble hi hota hai ... par kisi shayar ne kewal marmar sabd ka prayog nahi kiya ... sabne sangmarmar hi use kiya hai ... to maine bhi change kar diya ...

    raat hote 'hi'... maine jod diya hai ..

    itni baareeki se padhne ke liya shukriya ... aage bhi marg darshan karte rahiye...

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  24. bahut acha likha hai aapne shitijha ji...thanks for comment also...Archana

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  25. खुद को जोड़ने में टुकड़ा टुकड़ा होना और जुड़ने के बाद टूटने का खौफ।

    ज़िन्दगी ऐसे ही तो चलती है! काले बैकग्राउण्ड पर रक्तवर्णी अक्षर नहीं भाए। हॉरर फिल्म के पोस्टर से लगे।

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  26. @ zindagi
    thanks a lot

    @ girijesh ji
    shukriya padaarne ka ... kisi ke liye horror film ka poster ... kisi ke liye kaali maa ka roop ... apna apna nazariya ... :)

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  27. रात होते ही जलने लगता है आखों में तेरा ख्वाब
    दिन भर जो मेरे दिल में नासूर सा रहता है...

    टुकड़े-टुकड़े हुए हैं हम खुद को जोड़ने में
    जुड़ते-जुड़ते टूटने का खौफ हर वक़्त रहता है...
    -
    -
    वाह बहुत खूब
    ग़ज़ल की तासीर कुछ ऐसी कि पढ़कर दिल थम सा गया.
    यहाँ आकर बहुत ख़ुशी हुयी.
    -
    -
    आभार & शुभ कामनाएं

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  28. बहुत अच्छी रचना

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  29. kya khub likha hai aapne...sardiyon ki nami ki tarah dil mein utar gai.

    aapka comment padha apne blog par.
    bahut bahut shukriya.

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  30. बहुत ही बढ़िया और विचारशील ग़ज़ल है... अंतिम शे'र बहुत उम्दा है...

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  31. वाह!!!वाह!!! क्या कहने, बेहद उम्दा

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  32. वाह पहली बार पढ़ा आपको बहुत अच्छा लगा.
    आप बहुत अच्छा लिखती हैं और गहरा भी.
    बधाई.
    कभी फुर्सत मिले तो नाचीज़ की दहलीज़ पर भी आयें-
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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  33. अच्छा लिख रहीं हैं...आनन्द आया. नियमित लिखें.

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  34. खुद को जोड़ने में टुकड़ा टुकड़ा होना और जुड़ने के बाद टूटने का खौफ।.....जिंदगी का रास्ता कब संगमरमर रहता है...

    बहुत पसंद आई यह रचना !


    Ek baat kahna chaahunga, Is rachna me 7 misre sher ki tarah hain. Thoda mehnat karenge to achchhe sher aur ghazal aap kah payenge.

    Shubhkamnayen!

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  35. ant mein sabhi mein hi rahta hota to bahut achchha hota.gazal achchhi lagi.

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  36. ghumta hua aapke blog par pahuncha hoon..
    nirasha nahi huyi.. ek achhi rachna ne swagat ki....
    bahut hi sundar blog hai aapka..rachnayein to aur bhi sundar..
    yun hi likhte rahein....
    follow kiye ja raha hoon..aata rahoonga...

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  37. लिखते-पढ़ते जीना भी सीख जाओगे !
    काहे की इतनी जल्दी है...ज़िन्दगी में रंग जाओगे !

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  38. इतनी सुन्दर पोस्ट के लिये किन श्ब्दों का प्रयोग किया जाता है मुझे मालुम ही नहीं

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  39. देर से आया...क्षमाप्रार्थी...बहुत उम्दा!

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