Monday, October 11, 2010

दायरे....
















बचपन में कभी कभी
टूटे पंख घर ले आती थी
अब्बू को दिखाती थी..

अब्बू यूँ ही कह देते-......
   "इसे तकिये के नीचे रख दो 
   और सो जाओ
   सुबह तक भूल जाओ
   वो दस रुपये में बदल जाएगा
   बाज़ार जाना
   जो चाहे खरीद लाना..."

मैं ऐसा ही करती ...

रात में अब्बू चुपके से
पंख हटा कर दस रुपये रख देते..
सुबह उठते ही बेसब्री से
दुकाने खुलने का इंतज़ार करती
कोई एक मासूम सा सपना 
खरीद लाती ...

.......वो सोच कर आज मैं  
एक उदास हंसी हंस देती हूँ....

अब चाहे कितने ही टूटे हुए पंख
कितने ही रुपयों में क्यूँ न बदल जाएं
वो मुस्कराहट  
वो ख़ुशी नहीं खरीद सकते.....
हमारी बेहद ख्वाहिशें
ज़रुरत से ज़्यादा बड़े सपने
इनके दायरे में नहीं समाते ...

.....या फिर यूँ कहें
किसी दायरे में नहीं समाते....

60 comments:

  1. बहुत अलग और अच्छी सोच है आपकी। शायद पहली बार आया हूं आपके ब्लॉग पर। अगर यह सच है तो अफ़सोस है मुझे कि इतने अच्छे विचारों वाले ब्लॉग से इतने दिनों तक दूर कैसे रहा। समर्थक बन गया हूं। आता रहूंगा।
    अब, बात कविता की ...
    तकनीकी विकास (आधुनिकता, भौतिकता) के साथ-साथ जीवन मूल्यों की अवधारणाएं बदल रही हैं, समय के अभाव में एक रचनाकार से इस दायित्व की अपेक्षा की जाती है कि वह रचना में जीवनानुभवों और घटनाओं को समकालीन समय के समांतर विश्लेषित करे। आपने ऐसा ही किया है। नमन आपका! आभार इस बेहतरीन प्रस्तुति के लिए।
    बहुत अच्छी प्रस्तुति।
    या देवी सर्वभूतेषु चेतनेत्यभिधीयते।
    नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
    नवरात्र के पावन अवसर पर आपको और आपके परिवार के सभी सदस्यों को हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई!

    दुर्नामी लहरें, को याद करते हैं वर्ल्ड डिजास्टर रिडक्शन डे पर , मनोज कुमार, “मनोज” पर!

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  2. आपका बहुत बहुत शुक्रिया मनोज जी ..

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  3. bahut hi sunder bhavon se saji panktiyan kikhi hain aapne.... behad achhi rachna

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  4. अब्बू के बदले हुए दस के नोट से मासूम स सपना खरीदना ...और आज इतने और विस्तृत सपने कि दायरा ही छोटा पड़ जाये ....बहुत कुछ समेट लिया है आपने चंद पंक्तियों में ....अच्छी रचना

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  5. मोनिका जी , संगीता जी ... आपका बहुत बहुत धन्यवाद

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  6. निश्चित तौर पर हम जैसे-जैसे बड़े होते जाते हैं संसार के झमेले में ऐसे पड़ते जाते है कि बचपन की हँसी कब गुम हो जाती है पता ही नही चलता, और जब पता चलता है तो हम यही सोचते हैं कि काश वो वक्त वहीं ठहर जाता.
    बहोत ही अच्छी रचना
    धन्यवाद
    आपको नवरात्रि की ढेर सारी शुभकामनाएँ

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  7. बचपन का फलसफा ही निराला होता है...बहुत खूबसूरत भाव..बधाई.

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  8. बहुत सुन्दर लिखा है , मन यूं कह रहा है दायरे क्या सिमटे वो बड़ा अब्बू भी हमसे रूठ गया है ...

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  9. बहुत भावपूर्ण रचना है। बचपन और पिता का दुलार कभी नही भूलता।बहुत सुन्दर !!

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  10. क्षितिजा जी, (वाह आज तो मैंने लिख ही लिया)

    बहुत खुबसूरत जज्बातों को खुबसूरत अल्फाजों में लपेटा है आपने.......खास 'अब्बू' ...बहुत खुबसूरत अल्फाज़.....सुनहरा बचपन.........कभी सोचता हूँ खुदा ने हम सबको एक सा बनाया....मासूम , निश्छल........पर जैसे-जैसे हम बड़े होते जाते हैं .....वैसे-वैसे हम अपने चरों तरफ एक जाल बुनने लगते हैं |

    दिल से कहता हूँ , ये पोस्ट बहुत पसंद आई..........शुभकामनाये|

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  11. वाह.........कितने भोलेपन से आपने बचपन की बातों को शब्दों में पिरोया है !!
    इस बेहतरीन प्रस्तुति के लिए हमारे ओर से बधाई स्वीकार करें !!

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  12. aashish ji, yadavaa ji, sharda ji, paramjeet ji, abhiyaan ji...

    aap sab ka bahut bahut dhanyawaad ...

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  13. @ ansaari sahaab..

    आपको रचना पसंद आई उसके लिए शुक्रिया ... आपको ख़ास 'अब्बू' पसंद आया उसके लिए कहने चाहूंगी की हम असलियत में भी अपने पिता जी को 'अब्बू' ही कह कर बुलाते हैं ... खुशकिस्मती से ऐसे परिवार में जनम लिया जहां मानव धर्म सबसे ऊपर माना जाता है और पिता जी का उर्दू से ख़ास लगाव भी एक वजह थी की उन्होंने हमें 'अब्बू' कह कर बुलाना सिखाया ...

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  14. बहुत ही खूबसूरत कविता है, बचपन की कोमल यादों को आपने वर्तमान के जीवन दर्शन से संयुक्त कर दिया हे...कविता ने हृदय की गहराइयों तक प्रभावित किया।

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  15. ज़िन्दगी की छोटी छोटी बातों को देखने की इतनी सूक्ष्म दृष्टि हर किसी को नही मिलती और आपने उसका भरपूर उपयोग किया है……………बेहद उम्दा प्रस्तुति।

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  16. जिंदगी का ये दस्तूर है कि अभाव हमेशा निर्माण कि ओर प्रेरित करता है | गरीब का बच्चा चित्र भी बनाता है तो महलों के ,जबकि अमीर का बच्चा झोपड़ी का चित्र बनाता है | जब बचपन था तो पापा बनना चाहिते थे | आज जब पापा बन गए तो बचपन याद आता है ,और बचपन शब्द ही अपने-आप
    में इतना मासूम है कि बस पूछिए मत फिर इसकी यादें; तो क्या कहने | एक अति-सुन्दर कविता | धन्यवाद |

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  17. बहुत ही सुंदर ब्लॉग है आपका और रचना भी बहुत ही खूब बन पडी है ...शुभकामनाएं आपको

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  18. क्या बात है,

    ऐसे कई पंख और ना जाने कितनी चीज़ें इकठ्ठा किया करते थे हम, पर आज और बचपन के बीच में एक अधपकी समझदारी वाली उम्र 'teenage' आ गयी और किसी दिन यह सारी चीज़ें उठाकर कहीं ऐसी जगह डाल दी जहाँ से इन्हें वापस लाना नामुमकिन है. हाँ, यादें ज़रूर सुरक्षित है और अपने बेटे को जब यह सारी चीज़ें इकठ्ठा करते देखता हूँ तो एक अलग ही सुकून से भर जाता हूँ.

    आज बहुत भावुक कर दिया आपने.
    एक बढ़िया पोस्ट के लिए बधाई स्वीकारें.

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  19. ओह ! क्या लिखूं ..??? इस कविता के आगे तो सारी टिप्पणियाँ कम पड़ जाएँगी... बहुत दिनों बाद इतनी प्यारी सी रचना पढने को मिली..
    आपको बहुत बहुत बधाई...
    आपका लिखने का यह अंदाज़ बनाये रखें...

    मेरे ब्लॉग पर इस बार
    एक और आईडिया....

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  20. बहुत बड़ी सच्चाई जिंदगी की..

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  21. आपकी इस रचना ने हमारे भी मन के किसी कोमल हिस्से को स्पर्श कर लिया ....

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  22. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी रचना 12 -10 - 2010 मंगलवार को ली गयी है ...
    कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  23. रात में अब्बू चुपके से
    पंख हटा कर दस रुपये रख देते..
    सुबह उठते ही बेसब्री से
    दुकाने खुलने का इंतज़ार करती
    कोई एक मासूम सा सपना
    खरीद लाती ...

    ये पढ़ कर तो मैं भी कहीं खो गया था बचपन की यादों में
    सच है बचपन हर तरह से कितना अच्छा समय होता है
    तभी तो कहा है की

    ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो,
    भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी.
    मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन,
    वो कागज की कश्ती, वो बारिश का पानी

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  24. स्वप्न बड़े हो जाने से भी भाव छोटे नहीं हो जाते। भाव बनाये रखें, ऱाह मिल जायेगी। उत्कृष्ट प्रस्तुति।

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  25. बहुत ही खूबसूरत भाव हैं रचना के .
    सच वक्त के साथ सबकुछ बदल जाता है
    शुभकामनाये आपको.

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  26. बहुत ही गहरे और कोमल भाव संजोय हैँ आपने अपनी कविता मेँ। लाजबाव अभिव्यक्ति के लिए बहुत बहुत बधाई! -: VISIT MY BLOG :- मेरे ब्लोग पर पढ़िये इस बार........ जाने किस बात की सजा देती हो?..........गजल।

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  27. दायरे कुछ यू बढ़े, कि हम छोटे हो गये....


    बहुत गहरे भाव हैं इस रचना के.

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  28. बड़े होने की कुछ कीमत भी तो चुकानी पड़ती है :)

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  29. mahender ji, vandana ji, daddudarshanji , ajay ji, manoj ji, shekhar ji, saket ji, anil ji ...

    aap sab ka bahut bahut dhanyawaad ... :)

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  30. gaurav ji, praveen ji, shikha ji, ashok ji, sameer ji, arvind ji...

    aap sab ka bhi bahut bahut shukriya ... :)

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  31. आपकी कविता बचपन की याद दिलाती है.इस उठा - पटक की ज़िन्दगी से पढ़ने वाला थोड़ी देर के लिए दिमागी तौर पर बचपन की तरफ मुड़ जाता है.
    यही इसकी सार्थकता है.
    कृपया मेरी नई पोस्ट भी देखें.

    कुँवर कुसुमेश
    blog:kunwarkusumesh.blogspot.com

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  32. मुस्कुराहट और खुशी ...
    तलाश जारी है और फिर हमारे दायरे जब इतने बढ गये है.
    बहुत सुन्दर रचना

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  33. I wish I could read Hindi so fluently... I only manage to read translated stories, despite having taken Hindi as my second language at school :(

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  34. बचपन के वो हसीन पल ... आशा, उमीद का दामन सलामत रखने का प्रयास ....
    कितना कुछ बिना जाने ही कर देते हैं माँ बाप ...

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  35. xitija ji gambhir rachana

    yaha bhi aye

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  36. बहुत ही भावपूर्ण अभिव्यक्ति जो गहन सवालों को भी मासूमियत से पेश करती है...बहुत सुन्दर..आभार..

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  37. बहुत अच्छी कविता...बधाई.

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  38. bahut sunder rachna likhi hai aapne xitija sach main mann ko chu gai aapki rachna

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  39. bahut achi rachna hai xitija ji sach main dil ko chu gai

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  40. कविता की साफ़गोई बहुत अच्छी लगी हमें.

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  41. nice aap bahot atchha likhati hai ma'am

    if r u free visit my blog

    www.onlylove-love.blogspot.com

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  42. सुंदर एहसास जगाती पोस्ट।

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  43. dil ko chu lene wala ek marm..bahut sundar

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  44. बहोत ही अच्छी रचना

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  45. क्षितिजा जी,
    नमस्कारम्‌!
    बचपन की कुछ यादें ताज़ा करने की दिशा में आपकी यह रचना एक Catalytic agent सी बनकर उभरी है। बधाई...!

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  46. बचपन के उत्साह, मासूमियत और वयस्कता की संजीदगी को साथ पिरोती एक बहुत खुबसूरत रचना के लिए आपको बधाई, आभार.

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  47. कोमल और मासूम अहसासों का इतना खूबसूरत चित्रण कि बरबस मन बचपन की उस मासूम दुनिया के "जादुईलोक" में अनायास ही पहुंच जाता है. आभार.
    सादर
    डोरोथी.

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  48. मैंने अपना ब्लॉग URL बदला है और टेम्पलेट भी. नया पता www.rajeevsinghonline.blogspot.com

    मेरी कवितायेँ स्त्री केंद्रित है इसलिए आप सब को अच्छा लगता है तो मुझे लगता है कि रचना सार्थक रही.

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  49. dil ko choo gaya... isliye arz hai..

    मेरी जहिनियत को मेरी मासूमियत पे हंसी आती है.
    मेरी जहिनियत को अपनी मासूमियत पे हंसी आती है।
    मैं कितना जज्बाती और मासूम हुआ करता था।
    उन दिनों जब कड़कती सर्दी में रजाई ओढ़ते ही सोचता था,
    इस रजाई को सर्दी से कौन बचाएगा?
    उसी उलझन में उलझे , मैं नींद की आगोश में चला जाता था ।

    शेर , हाथी , भालू , बन्दर , घर ,कलम , किताब .
    हर रात तमाम खिलोनो को आपस में समेट कर चिपका के रखता था।
    ये सोच कर कहीं उन्हें डर न लगे ।

    मेरी ये बातें जान कर दुनिया , मुझे पागल, सरफिरा कह सकती है।
    कोई मनोवैज्ञानिक इसे बीमारी करार दे सकता है।
    लेकिन मैं इसे संवेदनशील हिर्दय की मासूमियत मानता हूँ।

    वो मासूमियत , जो जवान हो गयी है।
    अब मैं खिलोनो को नहीं समेटता ।
    बिखरे जज्बातों को बटोरता हूँ।
    टूटे दिलों को जोड़ता हूँ।
    रिश्तों की दरारें भरता हूँ।
    लेकिन ये उतना ही मुश्किल है,
    जितना वो सब आसन हुआ करता था।
    बेजान खिलोने एक जगह रह जाते थे।
    लेकिन इन्सान प्यार से क्यूँ नहीं रहता?

    आज भी जब मैं वैसी कोशिश करता हूँ ,
    तो मेरी जहिनियत को मेरी मासूमियत पे हंसी आती है।
    प्रस्तुतकर्ता Anand Rathore पर २:१९ पूर्वाह्न

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  50. ये दायरा ही इतना विस्तृत है की भर नही सकता ...जिंदगी दायरो मे सिमटी रास्तों पर बस भागती जा रही ....

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  51. good, even i have written some lines after reading your thoughts keep it up!!!!!

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  52. bachpan ki yadon ko taaza kar diya aapne

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  53. इतना दर्द, इतना गहरा भाव. कही कुछ छुटने का अहसास. वो जमाना अब गुजर गया, क्या वो फिर से आयेंगा? चलते चलते कहा पहुच गए?
    बहुत खुबसूरत.

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  54. kaii din se ise padhna chah rahi thi....finally...huh ;)
    bohot bohot bohot acchi hai...kya kahun...mmuuahhhh....too good.

    sach hai, sapne bohot bade ho gaye hain...choti cheezon ki khushi mehsoos karne ki shayad ab taaqat hi nahin rahi

    beautiful nazm yaara, awesome

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  55. अच्छी रचना अपनी पहचान को अपने ही रंग में रंगने की अच्छी सोच
    इस बार मरे ब्लॉग में........ महंगी होती शादियाँ

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  56. अगर हर ख्याविश पूरी हो जाए तो किसी दायरे की जरुरत ही ना हो ....
    ख्याशियो का दायरा इस आसमां से भी ज्यादा फैला हुआ हैं ....

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