Monday, October 18, 2010

बिना तर्क के.....

 
ख्वाबों की दुनिया
बिना 'शोर' के....

ज़िन्दगी का सफ़र
बिना 'पड़ाव' के....

एक नया सवेरा
बिना 'कोहरे' के...

मेरा अपना घर
बिना 'दीवारों' के....

सुबह का अखबार
बिना 'सुर्खी' के....

सुहाग की सेज
बिना 'जिस्मों' के....

इंसान का नाम
बिना 'पहचान' के....

आकाश, समुंदर, ज़मीन
बिना 'सरहद' के....

एक रिश्ता हमारा
बिना 'मैं' के....

पूर्णिमा का चाँद
बिना 'दाग' के....

गंगा का पानी
बिना 'पाप' के.....

मेरा आखरी लिबास
बिना 'सिलवट' के....

ये उम्मीदें मेरी
ये सपने मेरे...
बिना 'तर्क' के.....

44 comments:

  1. बेहद खूबसूरत और उम्दा अभिव्यक्ति।

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  2. प्रेम में 'मैं' नहीं होता..
    अच्छी बन पड़ी है.

    manojkhatrijaipur.blogspot.com

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  3. वाह,.. बहुत खूब...बहुत ही ख़ूबसूरत कविता...
    मेरे ब्लॉग पर इस बार...

    ज़िन्दगी अधूरी है तुम्हारे बिना. ....

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  4. क्षितिजा जी,

    बहुत खुबसूरत अहसास ........"बिना "....वाह ...वाह.....बहुत उम्दा ...सच है.....कभी-कभी सब कुछ अधूरा ही लगता है........शुभकामनाये|

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  5. मेरी ये टिप्पणी
    बिना 'लफ्ज़' के

    आप महसूस करें
    बिना 'सोच' के

    हर एक सपना
    बिना 'नींद' के

    पिरोया है आपने
    बिना 'धागे' के

    कैसे जीयेगी कविता
    बिना 'आप' के

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  6. 6/10


    सार्गाभित / सार्थक पोस्ट
    सरल और सहज तरह से लिखी रचना भी किस तरह अपना गहरा असर छोड़ सकती है, यह बात इस पोस्ट को पढ़कर सीखा जा सकता है.

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  7. तर्क तो अपने सीमित फ़लक में हमारी सभी संभावनाओं सपनों और उम्मीदों एवं उड़ानों को कैद कर लेना चाहता है, पर इन सब से पार जाकर ही जिंदगी की खूबसूरती कुछ और निखर उठती है, और जीने लायक बन जाती है. बेहद खूबसूरत रचना. आभार.
    सादर
    डोरोथी.

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  8. मेरा आखिरी लिबास बिना सिलवट के!
    एकदम अलग सोच है आपकी। और नई भी। एक सच्चे, ईमानदार रचनाकार के मनोभावों का वर्णन। बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई!
    उठ तोड़ पीड़ा के पहाड़!

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  9. इस बार मेरे नए ब्लॉग पर हैं सुनहरी यादें...
    एक छोटा सा प्रयास है उम्मीद है आप जरूर बढ़ावा देंगे...
    कृपया जरूर आएँ...

    सुनहरी यादें ....

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  10. hausla afzaiki liye aap sab ka bahut bahut shukriya ...

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  11. बहुत ही सार्थक अभिव्यक्ति!
    --
    19 अक्टूबर के चर्चा मंच पर
    इस पोस्ट को चर्चा में शामिल किया गया है!
    http://charchamanch.blogspot.com/

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  12. वाह क्या परवाज़ दिया है भावों को
    बहुत खूबसूरत ...
    मेरा अपना घर
    बिना 'दीवारों' के

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  13. bahut sundar likha hai aapne.........ati sundar

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  14. क्या खूब भावों कि उड़ान....बहुत सुन्दर प्रस्तुति...

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  15. bahut hi sunder bhav hai aapke
    bahut sunder
    kabhi yaha bhi aaye
    www.deepti09sharma.blogspot.com

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  16. खूबसूरत प्रस्तुति

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  17. मैंने आपकी पुरानी पोस्टें पढ़ी हैं.....बहुत रोज़ बाद देखा देहरी पर ठिठकी हुई स्मृति को

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  18. कविता में हर दृष्टि से नयापन है, भाव, बिम्ब ,शैली, शब्द संयोजन सब कुछ नया नया सा लगा...बधाई।

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  19. बहुत सुंदर रचना .... क्षितिजा

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  20. बहुत बेहतर उम्मीदें हैं..दुआएँ...

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  21. मेरी रिक्तता,
    बिना 'आप' के।

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  22. मै दंग रह गया
    मनोभाव भाप के

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  23. और मेरी यह टिप्पणी
    बिना टिप्पणी के :-)

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  24. ek sundar prayog..well done..keep going!

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  25. आपकी कविता में अविरल धारा प्रवाहित नज़र आई.
    सर...सर...सर...सर........................................
    क्या बात है.

    कुँवर कुसुमेश

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  26. Ek sundar sapana, kash poora hota!

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  27. thx 4 vist my blog
    from ashok

    my blog is www.onlylove-love.blogspot.com

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  28. अपना घर में बिना मैं का इंसान नहीं रहता।

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  29. @ देवेन्द्र जी ... आपने बिलकुल ठीक कहा .. लेकिन ये कहना चाहती हूँ की ये दो अलग ख़याल हैं जो आपने जोड़ के बताए..

    "मेरा अपने घर बिना दीवारों के "....मैंने घर कहा मकान नहीं ...घर कभी एक इंसान से नहीं बनता ... वो रिश्तों से बनता है ... और मुझे इन रिश्तों में दीवारें नहीं चाहियें

    "एक रिश्ता हमारा बिना मैं के".... किसी भी रिश्ते में अगर 'मैं' आजाये तो वो सफल नहीं होता

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  30. .

    बेहद खूबसूरत अभिव्यक्ति।

    .

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  31. शब्‍दों के एक कदम आगे की सोच ही शब्‍दों के उचि‍त अर्थ करती है।

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  32. वाह बेहद सुन्दर भावाभिव्यक्ति..........
    सार्थक एवं प्रभावी पोस्ट के लिए बधाई स्वीकार करें.....

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  33. और अच्छी कविता की तारीफ बगैर शब्दों ke ........नहीं हो सकती अच्छी कविता के लिए बधाई !

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  34. एक रिश्ता हमारा
    बिना मैं के ....
    बहुत खूब ......
    मैं का तात्पर्य स्वाभिमान भी होता है ....!!

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  35. मेरा आखरी लिबास
    बिना 'सिलवट' के....
    ....वाह क्या बात है ....

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  36. किस खूबसूरती से लिखा है आपने। मुँह से वाह निकल गया पढते ही।

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  37. कविता को जीना कोई आपसे सीखे ...........और अभिव्यक्ति भी .....
    शब्द कम पड़ रहें हैं टिप्पणी के लिए

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  38. आप ही ने चाहा था न ...इंसान का नाम बिना पहचान के ! लीजिए हाज़िर हूँ फिर एक बार मैं अनोनिमस.

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  39. just amazing ...

    bahut sundar rachna

    badhayi

    vijay
    kavitao ke man se ...
    pls visit my blog - poemsofvijay.blogspot.com

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