Monday, October 25, 2010

एक रूठा सा रब.....






















रूखा रूखा सा चाँद, एक फीकी सी शब् 
बुझी बुझी सी मैं, एक रूठा सा रब.....

 मैं औरत..... वो बरगद ....
....तहज़ीब की मिट्टी में गडी हूँ गहरी
सदियों से खोखले रिवाजों का बोझ सहती रही ...
....बहती हवाओं की जानिब झुकते चले गए
हाल ही में जन्में लचीले बांस हैं 'सब'.....


मैं औरत..... वो चट्टान ....
.......रवायतों की परतों से बनी
मेरा वजूद ठहरा रहा, और पिछड़ता गया...
......भागते वक़्त के साथ आगे बढ़ते चले गए
तेज़ तर्रार जदीद* रस्ते हैं 'सब' ...........


मैं औरत...... वो रूह....
.......वो क्षितिज हूँ, जो बे-इंतहा है
मेरे अंजाम में मेरी इब्तिदा का आगाज़ है....
.....मुझ तक पहुँचने की नाकाम कोशिश करते
हस्ती-ए-फ़ानी*, सिर्फ जिस्म हैं 'सब'.....

रूखा रूखा सा चाँद, एक फीकी सी शब् 
बुझी बुझी सी मैं, एक रूठा सा रब.....

[जदीद = आधुनिक
 हस्ती-ए-फ़ानी = नश्वर जीवन ]

89 comments:

  1. बेहद सुन्दर प्रस्तुति .....क्षितिजा

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  2. सभी ही अच्छे शब्दों का चयन
    और
    अपनी सवेदनाओ को अच्छी अभिव्यक्ति दी है आपने.

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  3. बहुत सुन्दर रचना है!
    --
    कल मंगलवार के कान्य मंच के लिए आपकी रचना चर्चा में ली गई है!
    http://charchamanch.blogspot.com/

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  4. बहुत सुन्दर भाव संग्रह्।

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  5. dil ki gahrai se likhi gayi sundar rachna ,badhai

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  6. वाह!! बहुत बेहतरीन प्रवाहमयी!!!

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  7. 6/10

    बहुत सुन्दर नज़्म
    शब्दों का प्रयोग लाजवाब है.
    नज़्म की शुरूआती दो पंक्ति बेहद दिलकश हैं.

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  8. बधाई हो क्षितिजा जी हमेशा की तरह बेहतरीन रचना के लिए....

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  9. aap sab ka hauslaafzai ke liye bahut bahut dhanyawaad ....

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  10. उर्दू के शब्दों में मात खा गया पर कविता तब भी सुन्दर लगी।

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  11. कुछ थोड़े से शब्दों में नारी के अस्तित्व और उसकी गरिमा को उड़ेल दिया | एक बहुत ही सुन्दर रचना | बधाई हो | धन्यवाद |

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  12. bahut sunder rachna hai xitija ji
    aise hi likhti rahiye

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  13. pahli do panktiyon par hi waah nikal gayi hai..keep going kshitja!

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  14. उफ़्फ़!
    इस नज़्म में कुछ है जो बार-बार सोचने पर मज़बूर कर रहा है। शब्द, शिल्प और भाव में आप ने बेहतरीन प्रस्तुति की है।
    समकालीन डोगरी साहित्य के प्रथम महत्वपूर्ण हस्ताक्षर : श्री नरेन्द्र खजुरिया

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  15. जीवन के अंतर्विरोधों के अंतर्द्वंद्व से जूझते अंतर्मन की वेदना का मर्मस्पर्शी चित्रण. आभार.
    सादर
    डोरोथी.

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  16. बेहतरीन है.
    क्या कहने हैं.

    कुँवर कुसुमेश

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  17. आज आपके ब्लॉग पर आकार बहुत अच्छा लगा...आपके पास खूबसूरत लफ्ज़ और ज़ज्बात हैं जिनका आपका हुनर से अपनी रचनाओं में इस्तेमाल करती हैं...बहुत परिपक्व लेखन है आपका...मेरी हार्दिक बधाई स्वीकार करें...

    नीरज

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  18. bohot bohot badiya... shabdo ka chayan bohot hi accha...

    thanks for sharing...

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  19. bahut khubshurat rachna.......aur sach me shabdo ka chayan umda......:)

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  20. bhut hi smvednsheel abhivykti umda shaili me sji hui . mere blog pr aap aai bhut achchha lga . aate rhiyega .
    khoobsoorat lfz bhavo ko kitna prbhavshali bna dete hai iska jita jata udahrn aapki ye shandar post hai . hai na !

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  21. क्षितिजा जी,

    एक शानदार रचना .........अर्थ बहुत गहरे हैं..........पर एक बात मेरी समझ नहीं आई..........आप ग़ज़ल लिखना चाह रही थी या नज़्म ......जहाँ तक मुझे लगा शुरुआत एक ग़ज़ल की तरह हुई पर बाद में वो बंध नहीं पाई.........

    दूसरी बात ' बरदग' से क्या अभिप्राय है ?
    जहाँ तक मुझे लगा शायद आपने ये 'बरगद' जो एक पेड़ होता है उसका ज़िक्र किया है |

    खैर ये तो मामूली बातें हैं ......अर्थों में रचना लाजवाब है....शुभकामनाये|

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  22. @imraan ji

    aapne theek kaha shuruaat gazal ki tarha hai ... magar hai ye nazm hi ... pehle ye soch ki ye do panktiyaan har antare ke baad bhi daal doon ... par usse nazm ki lambai bad rahi thi ... isliye shuruaat aur aakhir mein daal di...

    doosri baat ... maine 'bargad' ped ki hi baat ki hai ... jiski tulna 'baans' ke saath ki hai ...

    aapka itni baariki se rachna padna bahut achha laga ... shukriya ..

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  23. सुन्दर रचना ..बधाई

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  24. मैं औरत ...
    वो चट्टान जो रवायतों की परतों से बनी
    मेरा वजूद ठहरा..
    बढ़ते चले गए
    तेज तर्रार जदीद रस्ते..



    सुन्दर रचना बधाई

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  25. kshitija ji..
    namsakaar...vins ke blog se aapke yahaan aana hua....bahut achha laga jaan kar ki hamari taraha aap bhi urdu mein likhti hain, aapki rachna behtareen hai, urdu ke lafzon ka istemaal bahut hee khoobsurati se kiya hai aapne!

    is nacheez ke shehar mein aapka isteqbaal hai

    http://shayarichawla.blogspot.com/

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  26. bahut yatharth parak rachna.shayad ek naari hi in bhavon ko itni gahrai ke saath prastut kar sakti hai.aapka mere blog par aane ke lie shukriya! us kavita me maine janwaron,sabjiyon;pakkshiyon ke naam likhe the.

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  27. perfect....i hve no words for u....
    god bless u....

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  28. तहजीब क़ि मिटटी में गडी .... सच कहा है ... नारी को सब बंधन और रिवाजों में ढाला जाता है .... समाज क़ि इस विषम परिस्थिति को प्रभावी तरीके से लिखा है ...

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  29. क्षितिजा जी,

    मेरे ब्लॉग जज़्बात....दिल से दिल....... तक पर मेरी नई पोस्ट जो आपके ज़िक्र से रोशन है....समय मिले तो ज़रूर पढिये.......गुज़ारिश है |

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  30. शसक्त नज़्म के लिए बधाई। जाने क्यूँ कमेंट लिखते-लिखते यह ब्लॉग गायब हो जा रहा है...मेरी ही गलती होगी..तीसरी बार प्रयास कर रहा हूं..

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  31. "देखा तुमको जब

    लगी कुछ पहचानी सी

    भावों की लय में

    साथ वहने वाली सी !

    आत्मा सुन्दर ,

    मन भी सुंदर ,

    शब्दों की लय में

    बलखाती सी !

    देखा तुमको जब .....

    लगी तुम कुछ सखी सी ,

    तमन्नाओं की लय में ,

    साथ इठलाती सी ,

    क्या हो सकती हो,

    तुम भी मेरी सखी सहेली,

    छोडती हूँ तुम पर

    अपनी नैय्या दोस्ती की .....

    देखा तुमको जब ......"



    this for u ....

    n im waiting for yr reply.....

    priyanka

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  32. This comment has been removed by the author.

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  33. बहुत उम्दा रचना!

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  34. bohot bohot hi khoobsurat likha hai aapne....simply amazing. har misaal, har metaphor behtareen hai, लचीले बांस, चट्टान, बरगद...सब के सब कमाल...बोहोत ही कमाल लिखा है आपने...ravi ke blog se hote hue yahan ka raasta mila...so good to read u

    regards :)

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  35. सुन्दर अभिव्यक्ति .बधाई स्वीकारें .
    - प्रतिभा सक्सेना.

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  36. रूखा रूखा सा चांद, एक फीकी सी शब
    बुझी बुझी सी मैं, एक रूठा सा रब।

    भावप्रधान रचना...बधाई।

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  37. आज दो नये ब्लॉग देखे हैं, दोनों ही बेहद अच्छे लगे। एक ये ब्लॉग और एक saanjh.
    बहुत ही अच्छी नज़्म है, आभार स्वीकार करें।

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  38. सुन्दर रचना
    औरत सशक्त है ..

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  39. बढ़िया लिखा है आपने.....शुभकामनाएँ

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  40. महाभारत धर्म युद्ध के बाद राजसूर्य यज्ञ सम्पन्न करके पांचों पांडव भाई महानिर्वाण प्राप्त करने को अपनी जीवन यात्रा पूरी करते हुए मोक्ष के लिये हरिद्वार तीर्थ आये। गंगा जी के तट पर ‘हर की पैड़ी‘ के ब्रह्राकुण्ड मे स्नान के पश्चात् वे पर्वतराज हिमालय की सुरम्य कन्दराओं में चढ़ गये ताकि मानव जीवन की एकमात्र चिरप्रतीक्षित अभिलाषा पूरी हो और उन्हे किसी प्रकार मोक्ष मिल जाये।
    हरिद्वार तीर्थ के ब्रह्राकुण्ड पर मोक्ष-प्राप्ती का स्नान वीर पांडवों का अनन्त जीवन के कैवल्य मार्ग तक पहुंचा पाया अथवा नहीं इसके भेद तो परमेश्वर ही जानता है-तो भी श्रीमद् भागवत का यह कथन चेतावनी सहित कितना सत्य कहता है; ‘‘मानुषं लोकं मुक्तीद्वारम्‘‘ अर्थात यही मनुष्य योनी हमारे मोक्ष का द्वार है।
    मोक्षः कितना आवष्यक, कैसा दुर्लभ !
    मोक्ष की वास्तविक प्राप्ती, मानव जीवन की सबसे बड़ी समस्या तथा एकमात्र आवश्यकता है। विवके चूड़ामणि में इस विषय पर प्रकाष डालते हुए कहा गया है कि,‘‘सर्वजीवों में मानव जन्म दुर्लभ है, उस पर भी पुरुष का जन्म। ब्राम्हाण योनी का जन्म तो दुश्प्राय है तथा इसमें दुर्लभ उसका जो वैदिक धर्म में संलग्न हो। इन सबसे भी दुर्लभ वह जन्म है जिसको ब्रम्हा परमंेश्वर तथा पाप तथा तमोगुण के भेद पहिचान कर मोक्ष-प्राप्ती का मार्ग मिल गया हो।’’ मोक्ष-प्राप्ती की दुर्लभता के विषय मे एक बड़ी रोचक कथा है। कोई एक जन मुक्ती का सहज मार्ग खोजते हुए आदि शंकराचार्य के पास गया। गुरु ने कहा ‘‘जिसे मोक्ष के लिये परमेश्वर मे एकत्व प्राप्त करना है; वह निश्चय ही एक ऐसे मनुष्य के समान धीरजवन्त हो जो महासमुद्र तट पर बैठकर भूमी में एक गड्ढ़ा खोदे। फिर कुशा के एक तिनके द्वारा समुद्र के जल की बंूदों को उठा कर अपने खोदे हुए गड्ढे मे टपकाता रहे। शनैः शनैः जब वह मनुष्य सागर की सम्पूर्ण जलराषी इस भांति उस गड्ढे में भर लेगा, तभी उसे मोक्ष मिल जायेगा।’’
    मोक्ष की खोज यात्रा और प्राप्ती
    आर्य ऋषियों-सन्तों-तपस्वियों की सारी पीढ़ियां मोक्ष की खोजी बनी रहीं। वेदों से आरम्भ करके वे उपनिषदों तथा अरण्यकों से होते हुऐ पुराणों और सगुण-निर्गुण भक्ती-मार्ग तक मोक्ष-प्राप्ती की निश्चल और सच्ची आत्मिक प्यास को लिये बढ़ते रहे। क्या कहीं वास्तविक मोक्ष की सुलभता दृष्टिगोचर होती है ? पाप-बन्ध मे जकड़ी मानवता से सनातन परमेश्वर का साक्षात्कार जैसे आंख-मिचौली कर रहा है;
    खोजयात्रा निरन्तर चल रही। लेकिन कब तक ? कब तक ?......... ?
    ऐसी तिमिरग्रस्त स्थिति में भी युगान्तर पूर्व विस्तीर्ण आकाष के पूर्वीय क्षितिज पर एक रजत रेखा का दर्शन होता है। जिसकी प्रतीक्षा प्रकृति एंव प्राणीमात्र को थी। वैदिक ग्रन्थों का उपास्य ‘वाग् वै ब्रम्हा’ अर्थात् वचन ही परमेश्वर है (बृहदोरण्यक उपनिषद् 1ः3,29, 4ः1,2 ), ‘शब्दाक्षरं परमब्रम्हा’ अर्थात् शब्द ही अविनाशी परमब्रम्हा है (ब्रम्हाबिन्दु उपनिषद 16), समस्त ब्रम्हांड की रचना करने तथा संचालित करने वाला परमप्रधान नायक (ऋगवेद 10ः125)पापग्रस्त मानव मात्र को त्राण देने निष्पाप देह मे धरा पर आ गया।प्रमुख हिन्दू पुराणों में से एक संस्कृत-लिखित भविष्यपुराण (सम्भावित रचनाकाल 7वीं शाताब्दी ईस्वी)के प्रतिसर्ग पर्व, भरत खंड में इस निश्कलंक देहधारी का स्पष्ट दर्शन वर्णित है, ईशमूर्तिह्न ‘दि प्राप्ता नित्यषुद्धा शिवकारी।31 पद
    अर्थात ‘जिस परमेश्वर का दर्शन सनातन,पवित्र, कल्याणकारी एवं मोक्षदायी है, जो ह्रदय मे निवास करता है,
    पुराण ने इस उद्धारकर्ता पूर्णावतार का वर्णन करते हुए उसे ‘पुरुश शुभम्’ (निश्पाप एवं परम पवित्र पुरुष )बलवान राजा गौरांग श्वेतवस्त्रम’(प्रभुता से युक्त राजा, निर्मल देहवाला, श्वेत परिधान धारण किये हुए )
    ईश पुत्र (परमेश्वर का पुत्र ), ‘कुमारी गर्भ सम्भवम्’ (कुमारी के गर्भ से जन्मा )और ‘सत्यव्रत परायणम्’ (सत्य-मार्ग का प्रतिपालक ) बताया है।
    स्नातन शब्द-ब्रम्हा तथा सृष्टीकर्ता, सर्वज्ञ, निष्पापदेही, सच्चिदानन्द , महान कर्मयोगी, सिद्ध ब्रम्हचारी, अलौकिक सन्यासी, जगत का पाप वाही, यज्ञ पुरुष, अद्वैत तथा अनुपम प्रीति करने वाला।
    अश्रद्धा परम पापं श्रद्धा पापमोचिनी महाभारत शांतिपर्व 264ः15-19 अर्थात ‘अविश्वासी होना महापाप है, लेकिन विश्वास पापों को मिटा देता है।’
    पंडित धर्म प्रकाश शर्मा
    गनाहेड़ा रोड, पो. पुष्कर तीर्थ
    राजस्थान-305 022

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  41. बी बात नहीं करूगा बस ह्र्दय से सराह रहा हूं
    ताज़ा पोस्ट विरहणी का प्रेम गीत

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  42. हे इश्वर !! ऐसी रचनाएँ पढ़ के शब्दों का अकाल पड़ जाता है
    पहले ही पेराग्राफ ने निशब्द कर दिया
    इस रचना को भी पढ़ कर साबित हुआ आप बुद्दी जीवी [कम लिख कर भी ज्यादा सोचने पर मजबूर करने वाले ] और हम श्रम जीवी [ज्यादा लिख कर थोड़ा सोचने पर मजबूर करने वाले वो भी शायद ]
    अब देखिये ना कितना सारा टाइप कर दिया
    फोन्ट का ये कलर अच्छा लगा रहा है

    ReplyDelete
  43. अरे वाह ! कमेन्ट मोडरेशन भी नहीं है

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  44. shukriya gaurav ji ... aap manjhe hue khiladi hain.. thora bahut humnein bhi aapse seekh liya ...

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  45. क्षितिजा जी, पहली बार आपको पढ रहा हूँ। सचमुच गजब का लिखती हैं आप, इतनी संवेदना, इतनी मार्मिकता कहां से लाती हैं आप।


    ---------
    मन की गति से चलें...
    बूझो मेरे भाई, वृक्ष पहेली आई।

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  46. क्या कहें? सबसे पहले तो लिल्लाह, फिर वल्लाह, फिर अल्लाह!!
    क्या बात है!
    आशीष
    --
    पहला ख़ुमार और फिर उतरा बुखार!!!

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  47. बेहद खतरनाक पोस्ट है। बेहतरीन रचना के लिए बधाई।

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  48. दीपावली की बहुत बहुत शुभकामनाये !कभी यहाँ भी पधारे ...कहना तो पड़ेगा ................

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  49. ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
    आपको, आपके परिवार और सभी पाठकों को दीपावली की ढेर सारी शुभकामनाएं ....
    ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

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  50. “नन्हें दीपों की माला से स्वर्ण रश्मियों का विस्तार -
    बिना भेद के स्वर्ण रश्मियां आया बांटन ये त्यौहार !
    निश्छल निर्मल पावन मन ,में भाव जगाती दीपशिखाएं ,
    बिना भेद अरु राग-द्वेष के सबके मन करती उजियार !! “

    हैप्पी दीवाली-सुकुमार गीतकार राकेश खण्डेलवाल

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  51. bahut din baad ek achchi nazm padhi...

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  52. सुन्दर रचना। बधाई।आपको व आपके परिवार को भी दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें।

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  53. इसी तरह आप से बात करूंगा
    मुलाक़ात आप से जरूर करूंगा

    आप
    मेरे परिवार के सदस्य
    लगते हैं
    अब लगता नहीं कभी
    मिले नहीं है
    आपने भरपूर स्नेह और
    सम्मान दिया
    हृदय को मेरे झकझोर दिया
    दीपावली को यादगार बना दिया
    लेखन वर्ष की पहली दीवाली को
    बिना दीयों के रोशन कर दिया
    बिना पटाखों के दिल में
    धमाका कर दिया
    ऐसी दीपावली सब की हो
    घर परिवार में अमन हो
    निरंतर दुआ यही करूंगा
    अब वर्ष दर वर्ष जरिये कलम
    मुलाक़ात करूंगा
    इसी तरह आप से
    बात करूंगा
    मुलाक़ात आप से
    जरूर करूंगा
    01-11-2010

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  54. वाह! क्या चित्र बनाया है आपने.... सुन्दर..

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  55. दीपोत्सव की आपको और आपके परिवार को ढेरों शुभकामनाएँ

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  56. आप सभी का बहुत बहुत धन्यवाद ....


    आपको और आपके परिवार को दीपावली की हार्दिक शुभकामाएं ....

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  57. दीवाली की हार्दिक शुभकामनायें

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  58. क्षितिज जी , मैं इन शब्दों के द्वारा मन में बने उस चित्र की बात कर रहा था :)

    ReplyDelete
  59. sundar

    आपको समस्त परिवार सहित
    दीपावली की बहुत बहुत हार्दिक शुभ-कामनाएं
    धन्यवाद
    संजय कुमार चौरसिया

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  60. इस ज्योति पर्व का उजास
    जगमगाता रहे आप में जीवन भर
    दीपमालिका की अनगिन पांती
    आलोकित करे पथ आपका पल पल
    मंगलमय कल्याणकारी हो आगामी वर्ष
    सुख समृद्धि शांति उल्लास की
    आशीष वृष्टि करे आप पर, आपके प्रियजनों पर

    आपको सपरिवार दीपावली की बहुत बहुत शुभकामनाएं.
    सादर
    डोरोथी.

    ReplyDelete
  61. बदलते परिवेश मैं,
    निरंतर ख़त्म होते नैतिक मूल्यों के बीच,
    कोई तो है जो हमें जीवित रखे है ,
    जूझने के लिए प्रेरित किये है,
    उसी प्रकाश पुंज की जीवन ज्योति,
    हमारे ह्रदय मे सदैव दैदीप्यमान होती रहे,
    यही शुभकामना!!
    दीप उत्सव की बधाई...........

    ReplyDelete
  62. ज्योति पर्व के अवसर पर आप सभी को लोकसंघर्ष परिवार की तरफ हार्दिक शुभकामनाएं।

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  63. नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं

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  64. क्षितिजा जी,
    जब-जब कोई रचनाकार अपने ऐकान्तिक सृजन-पलों में स्वयं से संवाद स्थापित करता है, तब-तब वह कुछ ऐसी ही रचनाएँ लेकर सामने आता है।

    इस रचना में भाव की जो आभा है, वह अपनी समग्रता में दिपदिपाती हुई उभरकर सामने आयी है।

    ...और रही बात ‘बरगद’ की तो कहना होगा कि जब हम कोई प्रतीक उठाते हैं, तो उस प्रतीक की ‘अभिधा’ के साथ ही ‘लक्षणा’ और ‘व्यंजना’ के विकल्प भी आकर जुड़ जाते हैं, ख़ुद-ब-ख़ुद...! फिर देखना यह पड़ता है कि कौन-सी अर्थ-छटा यहाँ पर ज़्यादा ग्राह्य है!

    ‘बरगद’ के साथ जहाँ ‘दृढ़ता-विशालता-घनीभूत छाया-पूजनीयता’ का गुण है, तो वहीं एक अवगुण भी है; अवगुण... क्या मतलबऽऽऽ? यही कि ‘बरगद’ अपने इर्द-गिर्द छोटे-मोटे पौधे को पनपने नहीं देता... अपने निकटस्थ परिवेश का ‘सत्व’ स्वयं खींच लेता है... इस बिन्दु को केन्द्र में रखकर यदि विचार किया जाए, तो ‘बरगद’ थोड़ाऽऽऽ पूँजीवादी-सा भी है।

    ...किन्तु आपकी रचना में, मैं उसके इस ‘पूँजीवादी’ स्वरूप को ग्रहण नहीं कर रहा हूँ, वरना अनर्थ हो जाएगा। आपका आशय कदाचित्‌ ‘दृढ़ता’ से ही है क्योंकि दूसरी ओर ‘बाँस’ भी तो अपनी समग्र लचक के साथ खड़ा है...है न क्षितिजा जी!?

    क्षितिजा जी, अब आपसे एक अनुरोध:
    यह कि यदि आप प्राप्त टिप्पणियों पर अपनी टिप्पणी हिन्दी में लिखें तो ज़्यादा अच्छा है...रोमन में पढ़ना तनिक कष्टप्रद होता है... दिमाग़ ज़्यादा खपाना पड़ता है!

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  65. This comment has been removed by the author.

    ReplyDelete
  66. प्रवीण भाई के ब्लॉग से गुजर रहा था. सोचा "बातें" भी सुन-देख ली जाये. पहली ही पंक्ति से अहसास हो गया किसी "पहुचे" हुए के पास आ पंहुचा हूँ. क्या खूब: "बुझी बुझी सी मैं, एक रूठा सा रुब." ..वाह. और मैं आपको यकीं दिलाना चाहता हु कि, रुब रूठा नहीं हैं, वरना वो किस तरह इस रचना के माध्यम से आप तक पहुचता.
    और बरगद कि स्त्री से तुलना. लाजवाब. अपने को मिटा के नया जन्म देना, निष्पक्छ घना साया देना, स्त्री और बरगद के ही तो गुण हैं. वक्त कितना ही बदले, ये अपनी पृक्रति नहीं बदलते. आज के छुद्र व्यक्तित्वों कि तुलना निश्चित रूप से बांस के वृछो से कि जा सकती हैं.
    और हाँ उर्दू निश्चित रूप से सीखना चाहूँगा.

    बहुत खूब क्षितिजा, लिखते रहो.

    ReplyDelete
  67. @जीतेन्द्र जी आपका बहुत बहुत धन्यवाद .... और बरगद और बांस के बारे में इतना विस्तार से बताने के लिए भी शुक्रिया ... आपके कुछ बातों का उत्तर आपको राहुल जी के कमेन्ट में मिल जायेगा ....

    @राहुल जी ... आपका बहुत बहुत धन्यवाद ...

    ReplyDelete
  68. आप सब का बहुत बहुत शुक्रिया

    ReplyDelete
  69. सराहनीय लेखन....हेतु बधाइयाँ...ऽ. ऽ. ऽ
    चिठ्ठाकारी के लिए, मुझे आप पर गर्व।
    मंगलमय हो आपको, सदा ज्योति का पर्व॥
    सद्भावी-डॉ० डंडा लखनवी

    ReplyDelete
  70. सराहनीय लेखन....हेतु बधाइयाँ...ऽ. ऽ. ऽ
    चिठ्ठाकारी के लिए, मुझे आप पर गर्व।
    मंगलमय हो आपको, सदा ज्योति का पर्व॥
    सद्भावी-डॉ० डंडा लखनवी
    ----------------------------------

    ReplyDelete
  71. बहुत सुन्दर रचना .. उम्दा .. बधाई .. और आपको धन्यवाद ..मेरी रचनाओ को भी पसंद किया आपने.. शुभकामनायें..

    ReplyDelete
  72. क्षितिजा जी ,
    आपके खयालों की मेच्यूरिटी आई मीन भावों की गहनता /सघनता और रचनाओं ( हडियाँ का एक चावल ही काफी है ,फिलवक्त मैंने ये दो देख लिए ) में माजी के कई शेड्स के उभरते मोजेक -अक्स ,चाहों -उम्मीदों का अनंत आकाश किन्तु जमीनी सच्चाईयों की जकड़न और इस अंतर्द्वंद्व /अंतर्मंथन से उभरती अभिव्यक्ति आपकी कविता को एक मौलिक पहचान देती है -उक्ति वैचित्र्य तो खैर है ही ---जो आगाज में ही अंजाम की झलक पा रही है --मगर मुझे तो इस रचनाकार के अंजाम का जो पूर्वानुमान है उसमें बस एक शब्द की स्फुरदीप्ति है -बुलंदियां !
    (अब ब्लागाचार की बात करें तो आपने मेरी दो पोस्ट पढी और मैंने भी आपकी दो .....हिसाब बरोबर :) ..मैं आपको आगे भी हौले हौले पढ़ना चाहूँगा-!इसलिए मेरी पोस्टों पर आती रहा करियेगा -:) या फिर अपनी नयी नवेली रचना इस ईमेल पर भेज दिया करिएगा -drarvind3@gmail.com

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  73. बहुत सुंदर ...एक औरत के मनोविज्ञान पर कलम चलाई आपने ..मेरे ब्लॉग पर आने के लिए शुक्रिया ....

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  74. You really make a new world out of words....Another beautiful garland of words for people to realise how artificial life they are living.

    I am feeling too small after reading all your posts

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