Monday, November 8, 2010

शायद....















क्यूँ मद्धम सी हो चली हर उम्मीद की रौशनी 
....................अंधेरों से लड़ता कोई चिराग़
शायद, बुझ गया है कहीं.........................


पहचानी सी ख़ुश्बू महका रही है मेरा 'आज'
.......................माज़ी की कब्र में वो लम्हा 
शायद, सांस ले रहा है कहीं......................


कम हो गया एक और ख़ुदा को मानने वाला 
..........................किसी बेबस ग़रीब के घर 
शायद, कहर टूटा है कहीं.........................


सुर्ख हो गया अचानक मीठा 'चेनाब' का पानी
.......................फिर मोहब्बत की तकदीर से 
शायद, लहू रिस रहा है कहीं........................


ख़ामोशी चीर गई इंसानियत तेरे वजूद को
......................रोता बिलखता भूखा बच्चा 
शायद, सो गया है कहीं...........................


हर आह, हर आंसू, हर दर्द, हर ज़ख्म छुप गया
.......................मुर्दा रूह ने ज़िन्दा जिस्म का 
शायद, कफ़न ओढ़ा है कहीं..........................






92 comments:

  1. सरल ह्रदय से निकली बड़ी प्यारी रचना है क्षितिजा जी ....आनंद आ गया !

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  2. गहरी बात कह दी आपने। नज़र आती हुये पर भी यकीं नहीं आता।

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  3. मन को शोर नापसंद लगा,
    छोड़ मैं शहर आया,
    मन में फिर भी रह रह,
    वह शोर, गूँजता है कहीं।

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  4. महसूस करने वाली पीड़ा को कविता के शब्दों में बहुत ही सुंदर रूप में उकेरा है आपने अच्छी व सुंदर रचना के लिए क्षितीजा जी बधाई हो आपको !

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  5. 6.5/10

    ख़ामोशी चीर गई इंसानियत तेरे वजूद को
    रोता बिलकता भूखा बच्चा शायद, सो गया है कहीं..
    हर आह, हर आंसू, हर दर्द, हर ज़ख्म छुप गया
    मुर्दा रूह ने ज़िन्दा जिस्म का शायद, कफ़न ओढा है कहीं

    लेखन में संजीदगी है. रचना पाठक से आत्मसात होती है .. उससे संवाद करती है.

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  6. मन की गहराइयों से निकली हुई कविता .
    वाह क्या बात है

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  7. सुर्ख हो गया अचानक मीठा 'चनाब' का पानी
    .......................फिर महोब्बत की तकदीर से
    शायद, लहू रिस रहा है कहीं........................


    ख़ामोशी चीर गई इंसानियत तेरे वजूद को
    ......................रोता बिलकता भूखा बच्चा
    शायद, सो गया है कहीं...........

    बहुत मार्मिक रचना ....इसमें आपकी संवेदनशीलता का पता चलता है ...

    बिलकता ....बिलखता कर लें ...

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  8. @ संजय जी ... आपका धन्यवाद ..
    @ अनुपम जी .. आपका भी शुक्रिया ..
    @ प्रवीन जी ... आपने सही कहा ... ये शोर बंद ही नहीं होता
    @ अमर जी ... आपका धन्यवाद ...
    @ उस्ताद जी ... ६.५ की लिए धन्यवाद ...
    @ प्रयंका ... शुक्रिया..
    @ कुंवर जी ... धन्यवाद ...
    @ संगीता जी .... बहुत बहुत धन्यवाद ... 'बिलखता ' के लिए भी धन्यवाद ...

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  9. @क्षितिजा जी

    आप की रचना को आसानी से एक नजर में पढना मुश्किल नहीं नामुमकिन है [मेरी नजर में तो]

    [कहने का मतलब है गहराई बहुत होती है, जो अच्छी लगती है ]

    अभी पहले इन दो शब्दों का अर्थ जानने की बड़ी जिज्ञासा है

    1. माज़ी
    2. चनाब

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  10. गौरव जी इतना भी मुश्किल नहीं ... :)
    'माज़ी' का अर्थ है ... भूतकाल
    'चनाब' नदी है.. जिसमें 'सोहनी महिवाल' की सोहनी डूब कर मर गयी थी...

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  11. @क्षितिजा जी
    ये कहानी तो पता थी पर इन शब्दों से रिलेशन पता नहीं था .. सच्ची :) और ये अर्थ जान कर टिपण्णी करना आसान लग रहा है [हम तो पूरी इमानदारी से टिपण्णी करते हैं ] लेकिन .... ये क्या हुआऽऽऽ ? लो जी .... शब्दों का अर्थ जानकार भी वही हाल है जो पिछले रचना में था .... विचार उठने ही बंद हो गए ... वही रचनाएँ सर्वोत्तम हैं जिन्हें पढ़ कर विचार शून्यता की स्थिति आ जाती है [मेरी नज़रों में ]
    कोपी राईट नोटिस लग कर सही किया [ हा हा हा ]

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  12. हरेक शेर लाज़वाब..दिल को छू लेने वाला..बहुत सुन्दर प्रस्तुति..

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  13. पढ़ने के लिए ऐसी ही बेहतरीन रचनाएँ इस ब्लॉग पर हैं
    http://swapnamanjusha.blogspot.com

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  14. This comment has been removed by the author.

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  15. पीडा का मार्मिक चित्रण ………………बहुत गहरे उतरती है रचना……………दिल को छू गयी।

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  16. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी रचना 09-11-2010 मंगलवार को ली गयी है ...
    कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया

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  17. खामोश मन की पीड़ा दिल में कहीं गहरे तक उतर गई. शायद चिराग इस लिए मद्धिम पड़ चुके हैं कि सुबह अब होने वाली है. रात कितनी भी लंबी और अंधेरी क्यों न हो, सुबह को तो आना ही है. मार्मिक अभिव्यक्ति. आभार.
    सादर
    डोरोथी.

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  18. क्षितिजा जी आपने एक बहुत ही सुन्दर रचना को लिखा है
    और आप मेरे ब्लॉग पर आईं इसका बहुत बहुत शुक्रिया

    सलीम ख़ान
    लखनऊ
    zindagikiaarzoo.blogspot.com

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  19. गरीब तो फिर भी बेचारा खुदा को मानता रहेगा ...
    बहुत गहरे शेर लिखे हैं .. सच के करीब ... यथार्थ से भरे .

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  20. हर आह, हर आंसू, हर दर्द, हर जख़्म छुप गया कहीं,
    मुर्दा रूह ने जिंदा जिस्म का
    शायद कफ़न ओढ़ा है कहीं

    नई शैली में लिखी गई एक श्रेष्ठ रचना।

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  21. हर पंक्ति लाजवाब ..........बेहतरीन शब्‍द रचना ।

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  22. @कैलाश जी ... आपका धन्यवाद
    @ वंदना जी ... आपका धन्यवाद ...
    @ संगीता जी ... चर्चामंच मैं मेरी रचना शामिल करने के लिए शुक्रिया ...
    @समीउद्दीन जी ... आपका भी शुक्रिया ...
    @डोरोथी ... आपका धन्यवाद ...
    @सलीम... शुक्रिया आपका ...
    @दिगंबर ... धन्यवाद ... आपने सही कहा ... कुछ पल बाद बेचारा गरीब फिर उसी की ओर देखने लगता है ...
    @महेंद्र ... आपका बहुत बहुत धन्यवाद ...
    @ सदा .... शुक्रिया आपका

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  23. आपके लफ्जों में एक कसक है जो मन के भीतर चल रहे उन्माद को बहार लाने के लिए प्रयासरत है ....सुंदर और लाजबाब प्रस्तुति ...शुक्रिया

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  24. बहुत विस्तृत दृष्टि है आपकी | समय और समाज के हर तवके की सच्ची पैरोकारी | बहुत-बहुत-बहुत सुन्दर रचना | खाशकर "ख़ामोशी चीर गयी इंसानियत तेरे बजूद को ,
    रोता बिलखता भूखा बच्चा शायद सो गया है कहीं |" खुश-आमदीद | बधाई हो | धन्यवाद|

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  25. .

    इस बेहतरीन रचना के लिए बधाई !

    .

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  26. Kya gazab kee rachana hai! Wah! Mere paas alfaaz nahee!

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  27. बहुत ही शानदार अभिव्यक्ति की रचना की है आपने!
    --
    रचना में बहुत ही नये बिम्बों का प्रयोग किया गया है!

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  28. @ केवल जी ... आपका धन्यवाद
    @ daddudarshan जी ... आपका धन्यवाद ...
    @ ZEAL जी ... आपका धन्यवाद
    @ shah nawaz जी ... आपका भी शुक्रिया ...
    @ kshama ... आपका धन्यवाद ...
    @शास्त्री जी ... आपका बहुत बहुत धन्यवाद ...

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  29. बेहद संजीदा और सुंदर भाव लिए हैं सारी पंक्तियाँ.....

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  30. क्षितिजा जी... अपनी दुआओं में मेरा ख्याल रखने के लिए आपका बहुत शुक्रगुज़ार हूँ. मैं किन लफ़्ज़ों में आपका शुक्रिया अदा करूँ? फिलहाल आपकी दुआओं की बदौलत मैं ठीक हूँ.

    और आप कैसी हैं? उम्मीद है कि आप भी ठीक होंगीं....

    रिगार्ड्स

    महफूज़...

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  31. बहुत सुन्दर गज़ल है क्षितिजा जी.

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  32. Thanks.... lekin usmein kuch aisa tha bhi to nahi.... na.... jo usey delete karta...

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  33. महफूज़ जी ... बहुत ख़ुशी हुई आपको एक बार फिर अपने ब्लॉग पर देख कर ...:)

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  34. @ वंदना जी
    @मोनिका जी
    आपका बहुत बहुत धन्यवाद

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  35. एक एक पंक्ति गहरे अर्थ लिए है .सीधे दिल की तह तक जाती हुई बहुत सुन्दर रचना है क्षितिजा जी

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  36. मेरे एक मित्र जो गैर सरकारी संगठनो में कार्यरत हैं के कहने पर एक नया ब्लॉग सुरु किया है जिसमें सामाजिक समस्याओं जैसे वेश्यावृत्ति , मानव तस्करी, बाल मजदूरी जैसे मुद्दों को उठाया जायेगा | आप लोगों का सहयोग और सुझाव अपेक्षित है |
    http://samajik2010.blogspot.com/2010/11/blog-post.html

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  37. बहुत प्यारी लगी रचना.

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  38. गहरे दुःख दंश को संप्रेषित करती कविता -आखिर हुआ क्या ?
    दीपोत्सव की तनिक विलंबित शुभकामनाएं !

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  39. क्षितिजा जी
    अच्छा लगा आपको पढकर। बहुत अच्छी गजलें हैं आपकी। बधाई।

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  40. 'शायद' का मतलब होता है जो यकीनन तौर पे न कहा जा सके, यानी की जो हो भी सकता है और नहीं भी; तो जब तक शायद मकम्मल न हो, कम से कम तब तक तो हमको उम्मीदों को सकारात्मक रखना चाहिए... अगर हालात अच्छे न भी दिखे तो भी रचना का अंत तो हमारे हाथ में ही होता है न... तो क्यों न अच्छी कल्पना की जाए ....
    शब्दों का इस्तेमाल तो आप अभी ही जबरदस्त कर रहे है, थोडा भाव को भी दिशा दे... सोच एक बार जो राह पकड़ लेतें है, फिर उसकी आदी हो जाती है ... इसलिए जितना हो सके उसे सकारात्मक ही रखना चाहिए.. ये मेरा निजी मत है ...
    बाकी उम्र तो आप छोटू ही लगते है, आपकी उम्र में तो हमें कविता का 'क' भी नहीं आता था.... इस लिहाज़ से तो हमारी हैसियत ही नहीं कुछ भी बोलने की ...
    बहुत अच्छे , लिखते रहिये ....

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  41. क्षितिजा जी,

    क्या कहूँ ?......पहली बार आपके ब्लॉग पर ऐसा हुआ .....शब्द नहीं हैं .....बहुत सुन्दर ....तीसरा और पाँचवां शेर बहुत पसंद आया......बहुत खूब|

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  42. दिल की गहराइयों से निकली आवाज़ है आपकी यह रचना . सुंदर और सार्थक प्रस्तुति. बहुत-बहुत बधाई.

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  43. बहुत अच्छी लगी आप की ये रचना!

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  44. @ शिखा जी ... धन्यवाद
    @ दीपक जी ... ज़रूर कोशिश करेंगे ...
    @ समीर जी ... बहुत बहुत धन्यवाद ...
    @ मिश्रा जी ... :) .. कोई ख़ास बात नहीं ... सिर्फ ख़याल हैं ... जो कलमबद्ध किये हैं ...
    @ विनोद जी ...धन्यवाद
    @ मजाल जी ... बहुत बहुत शुक्रिया ... आपके सुझाव ध्यान में रखूंगी ...
    @ इमरान जी ... शुक्रिया..
    @ स्वराज्य जी ... धन्यवाद
    @ यश(वन्त) जी ... धन्यवाद

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  45. chanaab ke is surkh paani ko bhejiye vatvriksh ke liye, saath mein do teen anya rachnayen rasprabha@gmail.com per

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  46. अच्छा लगा आपके तरीके से जिंदगी को और आपको जानना. बहुत गहराई है हर बात में. एक एक बात मन को कचोट गई

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  47. bahut sundar abhivyakti!
    sahajta se bahut kuch kah jati hui panktiyan!!!

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  48. मन को स्पर्श करती रचना ।

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  49. नया ब्लॉग,
    नयी रचनाकार,
    नए बिम्ब,
    प्राणवान रचना ........
    एक ताजगी है ......जैसे सुबह-सुबह शीतल समीर का एक झोंका ......
    psychiatry के साथ कविता ......बेहतर संयोग .......
    लगता है आपको पढ़ते रहना पड़ेगा.
    अच्छी रचनाओं एवं उज्जवल भविष्य के लिए शुभ-कामनाएं

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  50. सुर्ख हो गया अचानक मीठा 'चनाब' का पानी
    .......................फिर महोब्बत की तकदीर से
    शायद, लहू रिस रहा है कहीं........................

    खूबसूरती से लिखे भाव, अच्छा लगा...

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  51. बहुत ही बढिया रचना. शुभकामनाएं

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  52. bohot hi khoobsurat...kya likha hai aapne yaara....its awesome

    kam ho gaya ek aur khuda ko maan'ne wala...amazing...too good !!

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  53. यकीनन कोई चिराग बुझा है
    वर्ना इतना धुँआ न होता और फिर अन्धेरा भी तो फैल गया है

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  54. aap mein kuch apna sa laga tabhi 'yaara' nikal gaya, maine to notice bhi nahin kiya tha ;)
    take care dear...luv u

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  55. @ मयंक जी... शुक्रिया
    @ रश्मि जी ... आपने मेरी रचना को इस काबिल समझा .. उसके लिए धन्यवाद ....
    @ रचना जी...धन्यवाद..
    @ अनुपमा जी ... धन्यवाद ...
    @ पलाश जी ... शुक्रिया ..
    @ रजनी ... शुक्रिया ..
    @ कुशलेंद्र जी ... शुक्रिया ..
    @ अविनाश जी ... धन्यवाद
    @ तुषार जी ... शुक्रिया
    @ मोहसिन जी ... शुक्रिया
    @ सांझ ... धन्यवाद ... आपका 'यारा ' बहुत अच्छा लगा .. :)
    @ वर्मा जी .. धन्यवाद ...

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  56. बहुत सुन्दर कविता..बधाई.

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  57. बहुत बढ़िया लगी यह रचना

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  58. बहुत सुन्दर लाईनें हैं, खासकर ये -

    कम हो गया एक और ख़ुदा को मानने वाला
    ..........................किसी बेबस ग़रीब के घर
    शायद, कहर टूटा है कहीं.........................

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  59. wakai behtareen. ye shabd bhi shayad aapki is rachna aur soch ke samne adna hai.

    mere blog par sundar sa comment dene ke liye shukriya. apna email share kejiye;
    snikhil.srivastava@gmail.com

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  60. आप बहुत अच्छा लिखती हें |इस रचना के लिए बधाई |
    मेरे ब्लॉग पर आने के लिए आभार
    आशा

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  61. विशुद्ध और सरल विचारों का बहुत ही सटीक या कहिये, अभूतपूर्व संकलन..धन्यवाद

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  62. सरल कोमल शब्दों में बहुत ही सुंदर नज़्म ....!!

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  63. शायद को खूब दर्शाया आपने....बढ़िया रचना

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  64. बहुत सरल शब्दों में बेहतरीन अभिव्यक्ति।

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  65. बहुत ही अच्छी नज़्म कही है क्षितिजा आपने.
    कम हो गया एक और ख़ुदा को मानने वाला

    ..........................किसी बेबस ग़रीब के घर

    शायद, कहर टूटा है कहीं.........................


    - विजय तिवारी ' किसलय'
    हिन्दी साहित्य संगम जबलपुर

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  66. शायद इसे ही कहते हैं अनूभूति की पराकाष्‍ठा। क्षितिजा जी, वाकई बहुत सुंदर लिखा है आपने। जितनी तारीफ की जाए कम है।

    ---------
    गायब होने का सूत्र।
    क्‍या आप सच्‍चे देशभक्‍त हैं?

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  67. उम्दा और खूबसूरत कविता है. पहली नज़र में इसका विन्यास कुछ अजीब लगा पर पढ़ने के बाद स्पष्ट हुआ.
    धन्यवाद.

    ReplyDelete
  68. माज़ी की कब्र में वो लम्हा शायद सांस ले रहा है कहीं।
    ख़ूबसूरत पंक्तियां बधाई।

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  69. बहुत ही उम्दा रचना. शुभकामनाएं

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  70. आप सब का बहुत बहुत शुक्रिया ...

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  71. badi der se aapke blog par hoon ..
    kuch kahana se bahtar hai ki ek baar aur padha jaaye aapki nazmo ko ..
    itna kaafi honga na ..

    well... bahut hi acchi tarah se likha hai

    badhayi sweekar kare.

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  72. “कम हो गया एक और खुदा को मानने वाला किसी बेबस गरीब के घर शायद, कहर टूटा है कहीं.” शायद आपके विचार में सिर्फ बेबस और गरीब ही खुदा को मानने वाले हैं, यह सही नहीं लगता. हाँ, यह ज़रूर सच है कि कहर टूटने के बावजूद भी गरीब और बेबस खुदा को बराबर मानते रहते हैं. तो फिर खुदा को मानने वाले कम कैसे हुए? कहर तो अमीरों पर भी टूटता है फिर उनके सन्दर्भ में आप क्या कहेंगे? अच्छा होता अगर आप इसे यूं कहते “किसी बेबस इंसान के घर शायद, कहर टूटा है कहीं”
    लेखन भावपूर्ण है परन्तु कहीं कहीं अशुद्ध शब्द अपरिपक्वता का बोध करवा देते हैं जो आपके सन्दर्भ में शायद सही नहीं है. जैसे महोब्बत और चनाब को “मोहब्बत” और “चेनाब” लिखा जाना चाहिए था. इसी तरह ओढा के स्थान पर “ओढ़ा” लिखना ज्यादा सही होगा. बोलचाल में तो कुछ भी बोलो चल जाता है परन्तु लेखन में अशुधियाँ हमेशा खटकती हैं.

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  73. @ Anonymous जी ...
    मैंने ये सोच कर 'गरीब' शब्द का प्रयोग किया था की 'गरीब ' कोई सिर्फ पैसे न होएं से गरीब नहीं कहलाता ... 'गरीब ' जिसके पास सुख शान्ति की दौलत न हो वो भी मेरी नज़र में 'गरीब है... पर मुझे आपका संशोधन पसंद आया .. काश मैंने भी इस तरह से लिखा होता ...
    “ओढ़ा”, “मोहब्बत” और “चेनाब" के बारे में बताने के लिए धन्यवाद ... आइन्दा कोशिश करुँगी की इस तरह की गलतियाँ न हों ...
    जहां तक आपने अपरिपक्व होने की बात कही है ... तो वो भी सही है ... कुछ ही महीने हुए हैं अपने ख्यालों को शब्द देते ... जब ये ब्लॉग शुरू किया था तो कभी सोचा भी नहीं था की कोई पढ़ेगा ... और जब आप जैसे जानकार लोग पढ़ते है और हमारी गलतियाँ बताते हैं तो तो अगली बार बेहतर लिखने की संभावने बढ़ जाती है ...
    आप यदि अपनी पहचान बता दें तो अगली बार से आप से इस्लाह करा किया करुँगी ....
    आपका बहुत बहुत शुक्रिया ...

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  74. यही सोच कर तो मैंने अदृश्य रहना स्वीकार किया ताकि आप लिखने से पूर्व मेरी सलाह न लें. लेखन में यह आवश्यक है कि जो आपका जेहन कहे सो आपकी कलम भी लिखे. अगर आपने मुझ से सलाह कर के लिखा तो वह आपकी नहीं बल्कि मेरी अभिव्यक्ति कहलाएगी और मैं ऐसा होने नहीं देना चाहता. ब्लॉग आपका है तो आवाज़ आप की ही होनी चाहिए. आपको मेरा सुझाव अच्छा लगा यह आपकी दरिया-दिली का परिचायक है...वरन् इस नाचीज़ के पास है ही क्या जो आप जैसी ज़दीद और काबिल शायरा को दे सके.

    ReplyDelete
  75. ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
    @ क्षितिजा जी और [anonymous ] मित्र
    आप दोनों का ये संवाद अदभुद है और anonymous ऑप्शन का इतना बेहतरीन इस्तेमाल पहली बार देखा है | आप जो भी हैं, आपके इस जज्बे को सलाम करता हूँ |
    ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

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  76. @ Anonymous जी...
    आपका बहुत बहुत धन्यवाद ... मैं कोशिश करुँगी की अगली बार बेहतर लिख सकूं ... .. आपने मुझे शायरा कह कर संबोधित किया मैं उसके बिलकुल लायक नहीं हूँ .. आपसे एक गुजारिश है की यहाँ पधारते रहे .. और अपनी अमूल्य टिपण्णी ज़रूर दें.. शुक्रिया

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  77. @ गौरव जी ... मैं भी दिल से anonymous जी की शुक्रगुज़ार हूँ ...

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  78. Awesome it is and Lonnggggggggggggggggg list of comments and feedback speaks that....Cheers

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  79. Your introductory para is superb .. please keep writing more so that we can bridge the gap between our heart and mind - I have often wondered how writers like you would be, do you always think deeply about everything or you have to conciously sit and get your mind on track and then write these soulful lines - you have amazing talent and I just want to wish you Good Luck and God Bless!

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