Monday, October 25, 2010

एक रूठा सा रब.....






















रूखा रूखा सा चाँद, एक फीकी सी शब् 
बुझी बुझी सी मैं, एक रूठा सा रब.....

 मैं औरत..... वो बरगद ....
....तहज़ीब की मिट्टी में गडी हूँ गहरी
सदियों से खोखले रिवाजों का बोझ सहती रही ...
....बहती हवाओं की जानिब झुकते चले गए
हाल ही में जन्में लचीले बांस हैं 'सब'.....


मैं औरत..... वो चट्टान ....
.......रवायतों की परतों से बनी
मेरा वजूद ठहरा रहा, और पिछड़ता गया...
......भागते वक़्त के साथ आगे बढ़ते चले गए
तेज़ तर्रार जदीद* रस्ते हैं 'सब' ...........


मैं औरत...... वो रूह....
.......वो क्षितिज हूँ, जो बे-इंतहा है
मेरे अंजाम में मेरी इब्तिदा का आगाज़ है....
.....मुझ तक पहुँचने की नाकाम कोशिश करते
हस्ती-ए-फ़ानी*, सिर्फ जिस्म हैं 'सब'.....

रूखा रूखा सा चाँद, एक फीकी सी शब् 
बुझी बुझी सी मैं, एक रूठा सा रब.....

[जदीद = आधुनिक
 हस्ती-ए-फ़ानी = नश्वर जीवन ]

Saturday, October 23, 2010

रात जाते-जाते....





















.रात की चादर जब उतरने लगी.
...सुबह की तरफ सरकने लगी...
......तारे सारे जगमगा उठे........
...और ख्वाब सारे धुंधला गए...

....तो ऐसे में ये क्या बात हुई....
..............जो भी हुई ...............
...........कुछ ख़ास हुई.............

.....चाँदनी अपनी तपिश में......
....सर्द जज़्बात पिघला गयी.....
....एक दर्द कहीं सुलगने लगा...
..तेरा सोया एहसास जगा गयी..

...........रात जाते-जाते............
...आज ये क्या काम कर गयी...
........अब भी मैं ज़िन्दा हूँ .........
........ये यकीन दिला गयी..........

Monday, October 18, 2010

बिना तर्क के.....

 
ख्वाबों की दुनिया
बिना 'शोर' के....

ज़िन्दगी का सफ़र
बिना 'पड़ाव' के....

एक नया सवेरा
बिना 'कोहरे' के...

मेरा अपना घर
बिना 'दीवारों' के....

सुबह का अखबार
बिना 'सुर्खी' के....

सुहाग की सेज
बिना 'जिस्मों' के....

इंसान का नाम
बिना 'पहचान' के....

आकाश, समुंदर, ज़मीन
बिना 'सरहद' के....

एक रिश्ता हमारा
बिना 'मैं' के....

पूर्णिमा का चाँद
बिना 'दाग' के....

गंगा का पानी
बिना 'पाप' के.....

मेरा आखरी लिबास
बिना 'सिलवट' के....

ये उम्मीदें मेरी
ये सपने मेरे...
बिना 'तर्क' के.....

Monday, October 11, 2010

दायरे....
















बचपन में कभी कभी
टूटे पंख घर ले आती थी
अब्बू को दिखाती थी..

अब्बू यूँ ही कह देते-......
   "इसे तकिये के नीचे रख दो 
   और सो जाओ
   सुबह तक भूल जाओ
   वो दस रुपये में बदल जाएगा
   बाज़ार जाना
   जो चाहे खरीद लाना..."

मैं ऐसा ही करती ...

रात में अब्बू चुपके से
पंख हटा कर दस रुपये रख देते..
सुबह उठते ही बेसब्री से
दुकाने खुलने का इंतज़ार करती
कोई एक मासूम सा सपना 
खरीद लाती ...

.......वो सोच कर आज मैं  
एक उदास हंसी हंस देती हूँ....

अब चाहे कितने ही टूटे हुए पंख
कितने ही रुपयों में क्यूँ न बदल जाएं
वो मुस्कराहट  
वो ख़ुशी नहीं खरीद सकते.....
हमारी बेहद ख्वाहिशें
ज़रुरत से ज़्यादा बड़े सपने
इनके दायरे में नहीं समाते ...

.....या फिर यूँ कहें
किसी दायरे में नहीं समाते....

Saturday, October 2, 2010

तेरे साए में पनाह दूं........















...................क्षितिज तक फैले
ज़िन्दगी के तनहा सेहरा को.....
तेरे
इश्क की बाहों में समा लूं....

तेरे  एहसास के गहरे समुन्दर से
उम्र की 'सूखी' रेत भिगो दूं....

......और कहीं किनारे बैठ कर  
थोड़े घरौंदे बना कर..............
एक गाँव बसा दूं...................

................कभी उसे हकीक़त
तो कभी ...सपने का नाम दूं...

तेरे साए में पनाह दूं................
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