Sunday, November 28, 2010

तस्वीर....

सोचा एक तस्वीर बनाऊं
आँखें बंद कीं
कुछ लकीरें सी उभर आयीं
टेढ़ी, मेढ़ी, आड़ी, तिरछी
फिर सोचा,
इसकी अपूर्णता को संवार लूं 
इसमें कोई रंग उतार दूं
लेकिन वो कौन सा रंग था 
जो इस तस्वीर की ताबीर करेगा ??
इसकी कमियों, 
अपूर्णताओं को दूर करेगा ??

हरा...??
मन किया पत्तों से उधार लूं
पर वो तो एक दिन सूख जायेगा 
मुरझाया, पेड़ से टूट कर
पैरों तले कुचला जायेगा

नीला...??
थोड़ा आसमान से मांग लूं
पर बादल के आते ही फीका पड़ जायेगा 
रात होता होता काला
उसका रंग तो बदलता जायेगा

लाल...??
लहू तो बहुत दिखता है
पर अब वो सुर्खी उसमें नहीं है 
धीरे धीरे सफ़ेद हो रहा है 
अपना वजूद खो रहा है ....

पीला...??
ये तो सूरज लिए फिरता है
पर सांझ होते होते 
वो कहीं खो जाता है
बुझ जाता है ....


इन्द्रधनुष...??
उसमें तो बहुत रंग दिखते हैं
पर सब आँख के धोखे हैं 
उससे मैं क्या उम्मीद करूँ 
जो खुद दूसरों के भरोसे है...

इतने में मेरी चेतना मुझसे बोल पड़ी- 
  "अपनी तस्वीर को क्यूँ न 
   तू अपने ही रंग से रंग दे...
   तेरा रंग जो पक्का है 
   कई इम्तेहानों से गुज़रा है 
   उस पर वक़्त का निशाँ नहीं 
   वो किसी का मोहताज नहीं 
   हमेशा दमकता रहेगा, चमकता रहेगा 
   और जिस दिन तू मिट्टी 
   उस मिट्टी से मिल जाएगी 
   रूप भले ही बदल जाये 
   पर रंग कभी नहीं बदलेगा"

अपनी तस्वीर को मैंने 
अपने ही रंग से रंग दिया 
नीचे अपना नाम लिख दिया
.......................... क्षितिजा

Friday, November 19, 2010

उफ़ !!....





















इस तरह,  हर गम से खुद को बचा रखा है 
एहसास को पत्थर का लिबास पहना रखा है...

मेरी आँखों में अक्सर उतर आता है सैलाब
कुछ तूफानों को अपने दिल में बसा रखा है....

तेरी यादों की क़ैद से भाग भी जाते लेकिन 
ये ताला हमनें अपने हाथों से लगा रखा है.....

राहे-उसूल पे कुछ न मिला एक दर्द के सिवा 
अपने वजूद को गहरे ज़ख्मों से सजा रखा है...

तड़प रहा है रूह का पंछी, कितने ही सालों से
रेशा-रेशा उम्र जोड़ जिस्म ने जाल बना रखा है ..

आहें, सर-सराहटें, सिसकियाँ, सरगोशियाँ हर सू
उफ़!! ख़ामोशी ने, तन्हाई ने, कितना शोर मचा रखा है...

Monday, November 8, 2010

शायद....















क्यूँ मद्धम सी हो चली हर उम्मीद की रौशनी 
....................अंधेरों से लड़ता कोई चिराग़
शायद, बुझ गया है कहीं.........................


पहचानी सी ख़ुश्बू महका रही है मेरा 'आज'
.......................माज़ी की कब्र में वो लम्हा 
शायद, सांस ले रहा है कहीं......................


कम हो गया एक और ख़ुदा को मानने वाला 
..........................किसी बेबस ग़रीब के घर 
शायद, कहर टूटा है कहीं.........................


सुर्ख हो गया अचानक मीठा 'चेनाब' का पानी
.......................फिर मोहब्बत की तकदीर से 
शायद, लहू रिस रहा है कहीं........................


ख़ामोशी चीर गई इंसानियत तेरे वजूद को
......................रोता बिलखता भूखा बच्चा 
शायद, सो गया है कहीं...........................


हर आह, हर आंसू, हर दर्द, हर ज़ख्म छुप गया
.......................मुर्दा रूह ने ज़िन्दा जिस्म का 
शायद, कफ़न ओढ़ा है कहीं..........................






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