Saturday, May 7, 2011

सलीब...

आप सब को मेरा प्रणाम... कुछ वक़्त से ब्लॉग्गिंग नहीं कर प् रही हूँ .. उसके लिए आप सब से माफ़ी चाहूंगी ... पहले typhiod हो गया था... अब पढाई में व्यस्त हूँ ... कुछ और समय के लिए आप सब से गैरहाज़िर रहने की इजाज़त चाहूंगी... आप सब  के सहयोग और स्नेह के लिए आभारी हूँ  ... बहुत बहुत धन्यवाद... 








अपनी सलीब अपने कांधों पे लिए होते हैं
ऐसे कुछ साज़-ओ-सामां रिहाई के होते हैं

तनहाइयों के सेहरा फांकते रहे कब से
सराबों ने खून और जलाया मेरा सराबों = मृगतृष्णा ]
ये साजिशों भरे बेरहम मंज़र 
कब क़ैफ़-ओ-क़रार के होते हैं... [कैफ़-ओ-क़रार = ख़ुशी और संतुष्टि ]

गुनेह्गारों की मानिंद खड़े हैं हम 
इन रवायतों के कठ्घरों में
दुनियावाले क्या समझेंगे इन्हें 
कुछ फैसले खुदा के होते हैं... 

पिघले मोम की तरह उतरे तेरे सांचे में
तेरे नज़रिए से खुद को तराशते गए 
उन्ही सोज़-ए-लम्हों में वजूद मेरा कायम है [सोज़ = जलना, प्रेम ]
जो लम्हे तेरी पनाह के होते हैं...

अपनी सलीब अपने कन्धों पे लिए होते हैं
ऐसे कुछ साज़-ओ-सामां रिहाई के होते हैं




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