Thursday, March 22, 2012

कारीगर.....

आप सब को मेरा प्रणाम... आप सबके बीच एक बार फिर हाज़िर हूँ... इतने लम्बे वक़्त तक गैर हाज़िर रहने के लिए माफ़ी चाहती हूँ... और अपनी वापसी की शुरुआत मैं अपनी एक पुरानी रचना के साथ करुँगी ... आशा करती हूँ की आपको पसंद आएगी ... धन्यवाद... 




 

काश! ये ज़ख्म भी कभी सिल पाता....
उधड़ा हुआ वो रिश्ता फिर जुड़ पाता....

न रिसता लहू, न दर्द उठता कभी
न ही नज़र आती कोई गाँठ कहीं
गिरहें न रहती, न निशाँ ही दिखता
न गिला , न शिकवा कोई....

काश! कोई कारीगर
 ऐसा मिल पाता .....
काश! ये ज़ख्म कोई ऐसे सिल 
पाता....
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