Saturday, May 7, 2011

सलीब...

आप सब को मेरा प्रणाम... कुछ वक़्त से ब्लॉग्गिंग नहीं कर प् रही हूँ .. उसके लिए आप सब से माफ़ी चाहूंगी ... पहले typhiod हो गया था... अब पढाई में व्यस्त हूँ ... कुछ और समय के लिए आप सब से गैरहाज़िर रहने की इजाज़त चाहूंगी... आप सब  के सहयोग और स्नेह के लिए आभारी हूँ  ... बहुत बहुत धन्यवाद... 








अपनी सलीब अपने कांधों पे लिए होते हैं
ऐसे कुछ साज़-ओ-सामां रिहाई के होते हैं

तनहाइयों के सेहरा फांकते रहे कब से
सराबों ने खून और जलाया मेरा सराबों = मृगतृष्णा ]
ये साजिशों भरे बेरहम मंज़र 
कब क़ैफ़-ओ-क़रार के होते हैं... [कैफ़-ओ-क़रार = ख़ुशी और संतुष्टि ]

गुनेह्गारों की मानिंद खड़े हैं हम 
इन रवायतों के कठ्घरों में
दुनियावाले क्या समझेंगे इन्हें 
कुछ फैसले खुदा के होते हैं... 

पिघले मोम की तरह उतरे तेरे सांचे में
तेरे नज़रिए से खुद को तराशते गए 
उन्ही सोज़-ए-लम्हों में वजूद मेरा कायम है [सोज़ = जलना, प्रेम ]
जो लम्हे तेरी पनाह के होते हैं...

अपनी सलीब अपने कन्धों पे लिए होते हैं
ऐसे कुछ साज़-ओ-सामां रिहाई के होते हैं




Monday, February 28, 2011

सुकून...




......सुकून ढूंढते ढूंढते आज
यादों के तहखाने में जा पहुंची...
सोचा एक बार यहाँ भी देख लूं...  
.......बहुत साल पहले
जब नए रिश्ते बनाए थे....
क्या मालूम....
....कुछ टूटे हुए रिश्तों के साथ
यहाँ रख दिया हो......

.....वहीँ एक कोने में पड़े  
पुराने दिनों पे नज़र गयी...
क्या हालत थी ....
उम्र हो चली थी ...
हैरान थी अब तक जिंदा कैसे हैं
...बदलते वक़्त की ज़र्द हवा
उन्हें ख़त्म नहीं कर पायी थी...
.....शायद बगल में रखे
टूटे रिश्तों के टुकड़ों से आती
एहसास की तपिश....
उन्हें आज भी जिंदा रखे थी...

मुझे देखा तो दिन बोले-
   " कभी हमें भी याद कर लिया करो "
बरसों बाद कोई बिछड़ा हुआ मिला था
कोई अपना मिला था....
मैं नम आखों से उनके पास पहुंची
वहीँ बैठ गयी .....
उनकी गोद में सर रख कर
वहीँ लेट गयी....
... सुकून के साथ सो गयी ......



Friday, January 28, 2011

एक पल... एक ज़िन्दगी...

















...तुम्हारे लिए... सिर्फ एक पल
मेरे लिए... एक ज़िन्दगी...

...जितने पल तुमने मेरे साथ गुज़ारे हैं
उतनी ज़िंदगियाँ मैंने जीं हैं...

...न जाने कितनी बार मैंने जन्म लिया
जाने कितनी बार मैं मरी हूँ...

...पिछली बार जब तुम गए थे
वो आखरी बार था जब मैं मरी थी...

...उस दिन के बाद तुम लौटे
मैं जिंदा हुई...

...एक जिस्म है जो साँसे ले रहा है
राख़ होने का इंतज़ार कर रहा है...

Tuesday, January 25, 2011

खिलौने वाला .....





















....एक खिलौना बनाने वाले ने
कितने ही खिलौने बनाये हैं  ...


....अलग अलग रंग के
अलग अलग रूप के
अलग अलग कद काठी के ....

......कुछ सोने के
कुछ भूसे के बने हैं ...
कुछ कच्चे, कुछ पक्के हैं ...

....कहीं कोई मखमल में लिपटा है
तो कोई चीथड़ों से ढका है....
किसी के हाथ में चाँद है
किसी का मिट्टी से सना है ....
कुछ की बगल में खंजर रहते हैं
कुछ के नाज़ुक पतले गले हैं ...
किसी  के सर पे दस्तार सजे हैं
तो कुछ उनके आगे झुके हैं ...

.... अनगिनित हैं बेशुमार हैं
उसके आँगन में बिखरे पड़े हैं ....


... तजुर्बे पे तजुर्बे करता रहता है
खिलौने ही खिलौने बनाता रहता है
चाबी घुमाता रहता है
खेलता रहता है ....

Saturday, January 8, 2011

एक बर्फ-ज़दा समंदर ...

आपको और आपके परिवार को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं .....











कुछ पल क्षितिज पर ठहर कर 
मानो पूछ रहा हो मुझसे -......
  "कब तक तड़पता रहूँगा, जलता रहूँगा ....
    अपनी ही आग में ........
    क्या तुम्हारे पास भी मुझे चैन नहीं मिलेगा...
    बिना बुझे.............अंगारों में लिपटे 
    क्या आज भी मैं यूँ ही लौट जाऊँगा..."

काश! कहीं से मिल जाता एक बर्फ-ज़दा समंदर .....
क्षितिज को छूता हुआ, शीशे सा, जमा हुआ............
और मैं साहिल को पीछे छोड़ 
सर्द लहरों का हाथ थाम कर ..............
चल दूं नंगे पांव इस कांच के सपने पर
बर्फ की सारी ठंडक, उसकी तासीर .....
अपने में जज़्ब करती हुई..................
अपने सूरज से मिलने की धुन में मगन 
उस में खोई हुई..................................

पहुँच कर उसके पास बिना कुछ कहे
बढ़ा दूँगी अपना हाथ...........
बस एक बार छू लेने को उसे............
करीब जा कर रख दूँगी 
अपना बर्फ़ सा पाँव.........................
उसके जलते सुलगते सीने पे .........
........या तो मैं बुझा दूँगी उसकी आग
या मैं भी जल जाउंगी उसकी आग में ... 

................... तुमने बताया था एक बार 
तुम्हारे शहर में होते हैं ऐसे समंदर........
इस बार जब आओ तो साथ लेते आना...
...................शायद ये ही एक रास्ता हो 
जो तुम तक पहुँचता हो ......................

Wednesday, December 1, 2010

लम्हे...

कुछ समय के लिए बहार जा रही हूँ ... आप सब से लगभग एक महीने बाद मुलाक़ात होगी ... जाते जाते इस पुरानी रचना फिर से पोस्ट किये जा रही हूँ ... उम्मीद है आप सब को पसंद आएगी ....


.........तुमसे मिलने के बाद,
दिल की इस बंजर ज़मीन पर,
मोहब्बत का एक पेड़ उग आया था,...
हम अक्सर उसके साए में मिला करते थे,
घंटों बातें किया करते थे,
वक्त गुज़ारा करते थे,....
लम्हे पे लम्हे इकठा होते गए,
उस पेड़ के पत्ते बनते गए,
हज़ारों लम्हों के हज़ारों पत्ते,
पेड़ घना होता गया,
और हरा होता गया,......

फिर एक दिन अचानक 
तुम्हें जाना था,.......
बस,.......जाना था,....
वो लम्हे सारे जो एक-एक कर संजोये थे,
......सब सूख गए,....
उस पेड़ से टूट गए,....
तुम उन्हें कुचलते हुए,
बेदर्दी से रौंदते हुए चलते गए,.....
हर पत्ता तुमसे कुछ कहता रहा,
चीखता रहा, चिल्लाता रहा,
रिश्तों की दुहाई देता रहा,......
लेकिन तुमने मुड़कर एक बार भी नहीं देखा,
आखिरकार उन्होंने दम तोड़ दिया,
वहीँ, उसी ज़मीं में दफ़न हो गए,
......

.........अब वहां से कोई नहीं गुज़रता,
आज भी उस उजड़े हुए पेड़ के पास,
कुछ रोने की आवाज़ें आतीं हैं,......
कहते हैं.... 
उन लम्हों की रूहें आज भी वहाँ भटकतीं हैं......

Sunday, November 28, 2010

तस्वीर....

सोचा एक तस्वीर बनाऊं
आँखें बंद कीं
कुछ लकीरें सी उभर आयीं
टेढ़ी, मेढ़ी, आड़ी, तिरछी
फिर सोचा,
इसकी अपूर्णता को संवार लूं 
इसमें कोई रंग उतार दूं
लेकिन वो कौन सा रंग था 
जो इस तस्वीर की ताबीर करेगा ??
इसकी कमियों, 
अपूर्णताओं को दूर करेगा ??

हरा...??
मन किया पत्तों से उधार लूं
पर वो तो एक दिन सूख जायेगा 
मुरझाया, पेड़ से टूट कर
पैरों तले कुचला जायेगा

नीला...??
थोड़ा आसमान से मांग लूं
पर बादल के आते ही फीका पड़ जायेगा 
रात होता होता काला
उसका रंग तो बदलता जायेगा

लाल...??
लहू तो बहुत दिखता है
पर अब वो सुर्खी उसमें नहीं है 
धीरे धीरे सफ़ेद हो रहा है 
अपना वजूद खो रहा है ....

पीला...??
ये तो सूरज लिए फिरता है
पर सांझ होते होते 
वो कहीं खो जाता है
बुझ जाता है ....


इन्द्रधनुष...??
उसमें तो बहुत रंग दिखते हैं
पर सब आँख के धोखे हैं 
उससे मैं क्या उम्मीद करूँ 
जो खुद दूसरों के भरोसे है...

इतने में मेरी चेतना मुझसे बोल पड़ी- 
  "अपनी तस्वीर को क्यूँ न 
   तू अपने ही रंग से रंग दे...
   तेरा रंग जो पक्का है 
   कई इम्तेहानों से गुज़रा है 
   उस पर वक़्त का निशाँ नहीं 
   वो किसी का मोहताज नहीं 
   हमेशा दमकता रहेगा, चमकता रहेगा 
   और जिस दिन तू मिट्टी 
   उस मिट्टी से मिल जाएगी 
   रूप भले ही बदल जाये 
   पर रंग कभी नहीं बदलेगा"

अपनी तस्वीर को मैंने 
अपने ही रंग से रंग दिया 
नीचे अपना नाम लिख दिया
.......................... क्षितिजा

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