Monday, August 23, 2010

लम्हे....












 




.........तुमसे मिलने के बाद,
दिल की इस बंजर ज़मीन पर,
मोहब्बत का एक पेड़ उग आया था,...
हम अक्सर उसके साए में मिला करते थे,
घंटों बातें किया करते थे,
वक्त गुज़ारा करते थे,....
लम्हे पे लम्हे इकठा होते गए,
उस पेड़ के पत्ते बनते गए,
हज़ारों लम्हों के हज़ारों पत्ते,
पेड़ घना होता गया,
और हरा होता गया,......

फिर एक दिन अचानक 
तुम्हें जाना था,.......
बस,.......जाना था,....
वो लम्हे सारे जो एक-एक कर संजोये थे,
......सब सूख गए,....
उस पेड़ से टूट गए,....
तुम उन्हें कुचलते हुए,
बेदर्दी से रौंदते हुए चलते गए,.....
हर पत्ता तुमसे कुछ कहता रहा,
चीखता रहा, चिल्लाता रहा,
रिश्तों की दुहाई देता रहा,......
लेकिन तुमने मुड़कर एक बार भी नहीं देखा,
आखिरकार उन्होंने दम तोड़ दिया,
वहीँ, उसी ज़मीं में दफ़न हो गए,
......

.........अब वहां से कोई नहीं गुज़रता,
आज भी उस उजड़े हुए पेड़ के पास,
कुछ रोने की आवाज़ें आतीं हैं,......
कहते हैं.... 
उन लम्हों की रूहें आज भी वहाँ भटकतीं हैं......

Friday, August 20, 2010

कारीगर.....



काश! ये ज़ख्म भी कभी सिल पाता....
उधड़ा हुआ वो रिश्ता फिर जुड़ पाता....

न रिसता लहू, न दर्द उठता कभी
न ही नज़र आती कोई गाँठ कहीं
गिरहें न रहती, न निशाँ ही दिखता
न गिला , न शिकवा कोई....

काश! कोई कारीगर
ऐसा मिल पाता .....
काश! ये ज़ख्म कोई ऐसे सिल
पाता....

दस्तक ....


कुछ इस तरह तुम्हारी याद ने दस्तक दी
निकल पड़ी घर से तुम्हारा निशान ढूँढने.....

जहां जहाँ से हमसफ़र बन के गुज़रे थे
चुन लायी हर उस राह-ए-गुज़र से.....

कुछ तकिये के नीचे कुछ पलकों में छुपाये हैं
ठहरी सी यादों के सहारे कुछ ख्वाब सजाये हैं......

Thursday, August 19, 2010

जुगनू.......







अंधेरों में कहीं खो गयी थी.............
ज़िन्दगी ने जब पहली आह भरी थी 
शायद .....तब से..........................

कुछ नज़र नहीं आ रहा था ..............
साया भी साथ छोड़ चूका था, शायद
अपने भी खो जाने के डर से............


बिलकुल अकेली थी....................
...............दोनों हाथों से................
तन्हाइयों की गर्द टटोलती हुई.........
.................आखें दस गुना खोल कर
राह खोजती हुई,.....बस चल रही थी

फिर दूर कहीं .............................
.............कुछ रौशनी सी नज़र आई
उम्मीद की एक लौ टिम-टिमाई.....
 .................मैं उसकी ओर चल दी
वो भी मेरी तरफ आ रही थी...........

एक जुगनू था........हांफता हुआ......
कुछ कांपता हुआ.........................
मुझसे बोला-..............................
......"कुछ चमका था शायद यहाँ......
......उसे देख कर इस तरफ आया हूँ..
......भटक रहा हूँ अकेला वीरानों में..
......एक साथी ढूँढने आया हूँ..........."

जिस्म को चीर देने वाली खामोशी में
सालों बाद किसी ने बात की थी.........
मेरा रोम-रोम उसे सुन रहा था..........
उसके हर लफ्ज़,.....उसकी आवाज़ में 
नहा रहा था..................................

उसको देखती रही, उसमें खो सी गयी
कुछ पल बाद होश आया, तो पाया-.....
......आखों की नमी होठों को छु रही थी
एक मुस्कान बनकर ठहर गयी थी......


उससे बोली-..................................
....."आखों में समुंदर छिपा था...........
......उम्र का दर्द अपने में लिए था.......
......तुम्हें देखते ही..........................
......ख़ुशी का आंसू बन गया..............
......हर ज़हर,.......... हर कड़वाहट......
......अपने संग बहा ले गया...............
......वो ही था जो तुमने देखा था ........
......वो ही था जो ........चमका था....."

 हाँ!...वो ही था जो चमका था...उस रात........!!






Monday, August 16, 2010

शुरुआत...



             चलिए शुरुआत एक बात से करतें हैं...कुछ ही महीने पहले की बात है ... किसी  ने मुझसे पुछा था की हमें कभी किसी फकीर को बुरा क्यूँ नहीं बोलना चाहिए ??... मैंने जवाब तो दिया था पर उसका जवाब, लाजवाब था...    
               उसने कहा की जो भी बात किसी  से कही जाती है वो एक energy के form में travel करती है... अगर हम receive कर लें तो हमपे असर होता है अगर हम receive न करीं तो वो 40 दिनों के बाद उसी तक पहुँच जाती है जिसने बोली होती है... तो फकीर इस energy को receive नहीं करते और अगर हम बुरा बोलतें है तो वो हमें वापिस आकर परेशान करती है... 
                ये सिर्फ फकीरों के साथ नहीं बल्कि हर इंसान पे लागू होता है ... अगर हम किसी की कही हुई बात को अनसुना कर दें तो वो वापिस चली जाएगी जहां से आई है... 
              उसकी बात सुन कर मैंने सोच ये बहुत अच्छा तरीका है खुश रहने का ... मैं भी कोशिश करुँगी ऐसा कुछ करने की... थोड़ी की भी... 
               फिर ख़याल आया की मुझे बुरा कौन बोलता है ... जाने या अनजाने ... और वो कौन हैं जिनकी बातों का असर मुझ पर होता है... वो मेरे अपने ही तो हैं...अगर मैं receive नहीं करुँगी तो वो वापिस जा कर उनको परेशान करेगा ...फिर वो दुखी होंगे ... और अगर वो दुखी होंगे तो मैं खुश कैसे रहूंगी....दोनों सूरतों में मैं खुश नहीं हो सकती...इससे अच्छा है की receive कर लूं ... किसी और को दुखी करने के बजाये खुद ही दुखी हो लूं... 
               दोस्त! तुमने बात तो बहुत पते की बताई थी ... शायद मेरे जैसे पागल इंसान पे लागू नहीं होती... पर मैं ये चाहती हूँ की तुम इससे हमेशा अपनाओ.. ताकि तुम हमेशा खुश रहो ... शायद तुम ये अपनाते भी हो क्यूंकि मैंने तुममे फकीरों सी बात पाई है ... कौन सी ???... इसका जवाब फिर कभी...पर हाँ आजतक मैंने जो तुम्हें बुरा कहा है ... उसने वापिस लौट कर मुझे बहुत दुखी किया है...
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