Tuesday, April 24, 2012

तेरी तस्वीर...














...कल उंगली से रेत पर 
तुम्हारी तस्वीर बनाई मैंने...

.....एक लहर आई 
अपने साथ ले गई..

....फिर क्या था 
हर तरफ, हर जगह 
बस तुम ही तुम...

.....समंदर में तुम 
      उमस में तुम 
      बादलों में तुम 
      बारिश की बूंदों में तुम 
      हर फूटती कोंपल में तुम 
      ताज़ी हवाओं में तुम 
      साँसों में तुम..........

...आज तुम ही हो 
जो मुझ को जिंदा रखे हो...
हर शै को जिंदा रखे हो...
ज़िन्दगी को जिंदा रखे हो...

...कल उंगली से रेत पर 
तुम्हारी तस्वीर क्या बना दी मैंने...

Monday, April 2, 2012

बारिश...




बारिश की बूंदों में ये जिस्म घुलता जा रहा है
कहीं एक गहरा जख्म और सुलगता जा रहा है...


कुछ बूँदें गुम हो गयीं, कुछ ज़मीं में जज़्ब हो गयीं
मगर एक काफिला सिर्फ मुझे ढूँढता आ रहा है...


रिश्तों की गहरी धुंध मेरा रास्ता रोके खड़ी है
कोई अजनबी उसे चीरता हुआ करीब आ रहा है...


एक घना बदल था जिसे हवा का झोंका उड़ा ले गया
वहीँ छोटा सा एक टुकड़ा आँधियों से लड़ता जा रहा है...


हर एहसास को दफ़न करके साँसे ले रही थी
ये कौन है जो अब मुझे जीना सिखा रहा है ...


कब से ज़िन्दगी की किताब ख़त्म करने में लगी हूँ
ये वक्त है की नयी कहानियाँ लिखता जा रहा है...

Thursday, March 22, 2012

कारीगर.....

आप सब को मेरा प्रणाम... आप सबके बीच एक बार फिर हाज़िर हूँ... इतने लम्बे वक़्त तक गैर हाज़िर रहने के लिए माफ़ी चाहती हूँ... और अपनी वापसी की शुरुआत मैं अपनी एक पुरानी रचना के साथ करुँगी ... आशा करती हूँ की आपको पसंद आएगी ... धन्यवाद... 




 

काश! ये ज़ख्म भी कभी सिल पाता....
उधड़ा हुआ वो रिश्ता फिर जुड़ पाता....

न रिसता लहू, न दर्द उठता कभी
न ही नज़र आती कोई गाँठ कहीं
गिरहें न रहती, न निशाँ ही दिखता
न गिला , न शिकवा कोई....

काश! कोई कारीगर
 ऐसा मिल पाता .....
काश! ये ज़ख्म कोई ऐसे सिल 
पाता....
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